बिजनेस ।अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध तथा पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनिया के ऊर्जा बाजार में बड़ी उथल-पुथल मचा दी है। अमेरिका में डीजल की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रीय औसत डीजल कीमत अब **6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर** निकल चुकी है। युद्ध शुरू होने के आसपास के स्तर की तुलना में डीजल करीब 55 से 60 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है।
अमेरिका में डीजल महंगा होने की खबर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसकी वजह यह है कि दुनिया का तेल बाजार आपस में जुड़ा हुआ है। पश्चिम एशिया में सप्लाई बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है और इसका असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल भारत में पेट्रोल-डीजल के खुदरा भाव में तत्काल बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर रहता है तो तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका में 6 डॉलर के पार डीजल
अमेरिका में डीजल की राष्ट्रीय औसत कीमत पहली बार 6 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंची है।
GasBuddy के आंकड़ों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रीय औसत डीजल कीमत 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर निकल गई। फरवरी में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के समय यह कीमत करीब 3.76 डॉलर प्रति गैलन के आसपास थी।
यानी कुछ महीनों के भीतर डीजल की कीमत में करीब 55 से 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
यह केवल वाहन चालकों के लिए समस्या नहीं है।
अमेरिका में ट्रक, खेती, माल परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों में बड़े पैमाने पर डीजल इस्तेमाल होता है।
इसलिए डीजल महंगा होने से लगभग पूरी अर्थव्यवस्था की लागत प्रभावित हो सकती है।
आखिर इतनी तेजी क्यों आई?
डीजल की कीमत बढ़ने के पीछे केवल एक कारण नहीं है।
सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तेल सप्लाई में व्यवधान है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से बाजार में तेल की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है।
इसके अलावा लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में भी जहाजों की सुरक्षा को लेकर खतरा बना हुआ है।
सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और क्षेत्रीय सप्लाई नेटवर्क पर हुए हमलों ने स्थिति और गंभीर कर दी है।
सऊदी अरब से भी आई बुरी खबर
वैश्विक तेल बाजार के लिए दूसरी बड़ी चिंता सऊदी अरब है।
अगस्त में सऊदी अरब की क्रूड सप्लाई करीब **60 लाख बैरल प्रतिदिन** तक गिर गई।
यह तीन दशक से ज्यादा का निचला स्तर बताया गया है।
सऊदी अरब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है।
अगर वहां से बाजार में आने वाला तेल कम होता है तो दूसरे उत्पादकों पर सप्लाई बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है।
ऐसे समय में अगर दूसरे देशों में भी उत्पादन या निर्यात बाधित हो तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत तेजी से ऊपर जा सकती है।
100 डॉलर के ऊपर कच्चा तेल
पश्चिम एशिया में सप्लाई की चिंता के कारण ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है।
11 सितंबर को ब्रेंट करीब 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था।
इससे पहले यह 107 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी पहुंच गया था।
WTI क्रूड भी 100 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।
साप्ताहिक आधार पर कच्चे तेल में करीब 8 प्रतिशत की तेजी दर्ज होने की स्थिति बनी।
यानी तेल बाजार में फिलहाल बहुत ज्यादा अस्थिरता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अमेरिकी डीजल?
सवाल यह उठता है कि अमेरिका में डीजल महंगा हुआ है तो भारत को चिंता क्यों होनी चाहिए?
इसका जवाब वैश्विक ऊर्जा बाजार में छिपा है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।
अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड फ्यूल की कीमत बढ़ती है तो भारत की आयात लागत भी बढ़ती है।
अमेरिका में रिकॉर्ड डीजल कीमत इस बात का संकेत है कि केवल क्रूड ही नहीं बल्कि रिफाइंड फ्यूल मार्केट में भी सप्लाई तंग है।
यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल का भाव
11 सितंबर को भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा भाव में कोई बड़ी नई बढ़ोतरी नहीं की गई।
दिल्ली में पेट्रोल करीब **102.12 रुपये प्रति लीटर** और डीजल करीब **95.20 रुपये प्रति लीटर** है।
लखनऊ में पेट्रोल करीब **101.86 रुपये** और डीजल **95.36 रुपये प्रति लीटर** है।
मुंबई में पेट्रोल करीब **111.21 रुपये** और डीजल करीब **97.83 रुपये प्रति लीटर** बताया गया।
शहरों के बीच कीमत में अंतर मुख्य रूप से स्थानीय टैक्स और दूसरे शुल्कों के कारण होता है।
क्या भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
इसका सीधा जवाब है—**संभावना बढ़ी है, लेकिन बढ़ोतरी तय नहीं है।**
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होना पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमत पर दबाव जरूर बनाता है।
लेकिन भारत में खुदरा ईंधन कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती।
रुपया-डॉलर विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, तेल कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन, केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स तथा दूसरे शुल्क भी इसमें शामिल होते हैं।
इसलिए ब्रेंट क्रूड के एक-दो दिन 100 डॉलर पार रहने से पंप पर तुरंत उसी अनुपात में बढ़ोतरी जरूरी नहीं है।
तेल कंपनियों पर बढ़ रहा दबाव
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक महंगा रहता है और घरेलू कीमतें नहीं बढ़तीं तो तेल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आता है।
कंपनियां महंगा कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन करती हैं और पेट्रोल-डीजल तैयार करती हैं।
अगर कच्चे तेल की लागत तेजी से बढ़े लेकिन खुदरा कीमत स्थिर रहे तो कंपनियों को प्रत्येक लीटर पर मिलने वाला मार्जिन घट सकता है।
यही स्थिति लंबे समय तक रहने पर कीमत संशोधन की संभावना बढ़ सकती है।
रुपया कमजोर हुआ तो दोहरा झटका
भारत के लिए केवल कच्चे तेल की डॉलर कीमत महत्वपूर्ण नहीं है।
डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल डॉलर में खरीदता है।
मान लीजिए कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल है और इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाता है।
ऐसी स्थिति में भारतीय कंपनियों को उसी बैरल के लिए रुपये में ज्यादा भुगतान करना पड़ेगा।
यानी महंगा तेल और कमजोर रुपया मिलकर आयात बिल पर दोहरा दबाव डाल सकते हैं।
डीजल महंगा होना ज्यादा चिंताजनक क्यों?
डीजल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण ईंधन है।
देश में लाखों ट्रक डीजल से चलते हैं।
इन्हीं ट्रकों से अनाज, फल, सब्जियां, दूध, दवाइयां, कपड़े और दूसरी जरूरी वस्तुएं एक जगह से दूसरी जगह पहुंचती हैं।
खेती में ट्रैक्टर और कई कृषि मशीनों में भी डीजल का इस्तेमाल होता है।
अगर डीजल महंगा होता है तो माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।
ट्रांसपोर्टर बढ़ी हुई लागत को किराए में जोड़ सकते हैं।
अंततः इसका असर आम ग्राहक द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं की कीमत पर पड़ सकता है।
सब्जी से लेकर दूध तक असर
डीजल की कीमत में बड़ी बढ़ोतरी का असर धीरे-धीरे पूरी सप्लाई चेन में फैल सकता है।
खेत से मंडी तक सब्जियां पहुंचाने में ट्रक और छोटे कमर्शियल वाहन इस्तेमाल होते हैं।
मंडी से शहर और शहर से दुकानों तक भी परिवहन लागत जुड़ती है।
अगर प्रत्येक चरण में डीजल लागत बढ़ती है तो सब्जी और फल की अंतिम कीमत पर दबाव आ सकता है।
इसी तरह दूध और दूसरे जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की सप्लाई में भी परिवहन बेहद महत्वपूर्ण है।
महंगाई बढ़ने का खतरा
कच्चा तेल महंगा होना भारत की महंगाई के लिए भी चिंता का कारण है।
तेल की कीमत केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहती।
ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, विमानन और कई उद्योग ऊर्जा की कीमतों से प्रभावित होते हैं।
अगर कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है तो वे इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं।
इससे महंगाई बढ़ सकती है।
महंगाई बढ़ने पर भारतीय रिजर्व बैंक की ब्याज दर नीति पर भी असर पड़ सकता है।
हवाई यात्रा भी हो सकती है महंगी
कच्चे तेल की तेजी का असर विमान ईंधन यानी ATF पर भी पड़ सकता है।
एयरलाइंस की कुल लागत में ईंधन का बड़ा हिस्सा होता है।
अगर ATF लंबे समय तक महंगा रहता है तो एयरलाइंस के खर्च बढ़ सकते हैं।
कंपनियां इसका कुछ हिस्सा हवाई किराए में शामिल कर सकती हैं।
इसलिए तेल संकट का असर सड़क परिवहन के साथ हवाई यात्रा पर भी दिखाई दे सकता है।
अमेरिका में महंगाई की चिंता बढ़ी
अमेरिका में डीजल की रिकॉर्ड कीमत ने वहां महंगाई की चिंता बढ़ा दी है।
डीजल का इस्तेमाल माल ढुलाई में बड़े पैमाने पर होता है।
अगर ट्रक कंपनियों का ईंधन खर्च बढ़ता है तो वे अपने ग्राहकों से ज्यादा किराया वसूल सकती हैं।
इसके बाद कंपनियां बढ़ी हुई लॉजिस्टिक लागत को उत्पादों की कीमत में जोड़ सकती हैं।
यही कारण है कि अमेरिकी बाजार में रिकॉर्ड डीजल भाव को केवल ऊर्जा संकट नहीं बल्कि महंगाई के खतरे के रूप में भी देखा जा रहा है।
अमेरिका में डीजल स्टॉक भी कम
अमेरिका में डीजल इन्वेंट्री पांच साल के औसत से करीब 13 प्रतिशत नीचे बताई गई है।
कम स्टॉक और बढ़ती मांग कीमतों को और ऊपर धकेल सकती है।
आने वाले महीनों में उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों की तैयारी और कृषि सीजन के कारण डीजल की मांग बढ़ सकती है।
ऐसे समय में अगर वैश्विक सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
भारत को रूस से मिल सकता है सहारा
भारत के लिए राहत का एक महत्वपूर्ण स्रोत रूस है।
रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हुआ है।
मौजूदा सप्लाई संकट के बीच भी भारत और रूस के बीच ऊर्जा व्यापार महत्वपूर्ण बना हुआ है।
अगर रूस से पर्याप्त मात्रा में तेल मिलता रहता है तो पश्चिम एशिया से होने वाली सप्लाई की कमी का कुछ असर कम किया जा सकता है।
लेकिन वैश्विक बाजार में कीमत बहुत ज्यादा बढ़ने पर किसी एक सप्लायर से मिलने वाला तेल पूरे प्रभाव को खत्म नहीं कर सकता।
सरकार के पास क्या विकल्प?
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो सरकार और तेल कंपनियों के सामने कई विकल्प हो सकते हैं।
तेल कंपनियां कुछ समय तक कम मार्केटिंग मार्जिन स्वीकार कर सकती हैं।
सरकार टैक्स में बदलाव के जरिए ग्राहकों पर पड़ने वाला असर कम कर सकती है।
सप्लाई के स्रोतों में विविधता बढ़ाकर सस्ता तेल खरीदने की कोशिश की जा सकती है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी गंभीर सप्लाई संकट के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन इनमें से किस विकल्प का इस्तेमाल होगा, यह संकट की अवधि और कीमतों की स्थिति पर निर्भर करेगा।
120 डॉलर पहुंचा क्रूड तो क्या होगा?
अगर पश्चिम एशिया का तनाव और बढ़ता है और ब्रेंट फिर 120 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंचता है तो भारत के लिए चुनौती ज्यादा गंभीर हो सकती है।
तेल कंपनियों का घाटा बढ़ सकता है।
आयात बिल बढ़ेगा और रुपये पर दबाव आ सकता है।
महंगाई बढ़ने की आशंका भी मजबूत होगी।
ऐसी स्थिति लंबे समय तक रहती है तो घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों को स्थिर रखना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
हालांकि खुदरा कीमत में कितना बदलाव होगा, इसका पहले से सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं है।
तनाव कम हुआ तो मिल सकती है राहत
तेल बाजार के लिए सबसे सकारात्मक खबर पश्चिम एशिया में तनाव कम होना होगी।
अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर के महत्वपूर्ण मार्गों से जहाजों की सामान्य आवाजाही शुरू होती है तो सप्लाई को लेकर बाजार की चिंता कम हो सकती है।
ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत तेजी से नीचे भी आ सकती है।
11 सितंबर को संभावित कूटनीतिक प्रयासों की खबर के बाद ब्रेंट और WTI में गिरावट देखने को मिली।
यह बताता है कि तेल बाजार फिलहाल युद्ध से जुड़ी हर खबर पर तेजी से प्रतिक्रिया कर रहा है।
आने वाले दिनों में इन 4 चीजों पर रखें नजर
भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा या नहीं, इसे समझने के लिए सबसे पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत देखनी होगी।
दूसरा महत्वपूर्ण संकेत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही होगी।
तीसरा सऊदी अरब का उत्पादन और निर्यात है।
चौथा डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की चाल होगी।
अगर चारों मोर्चों पर दबाव बना रहता है तो भारत के लिए तेल महंगा होने का खतरा बढ़ेगा।
फिलहाल भारत को राहत लेकिन खतरा टला नहीं
अमेरिका में युद्ध शुरू होने के बाद डीजल की कीमत में करीब 55 से 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी और रिकॉर्ड 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंचना वैश्विक ऊर्जा संकट की गंभीरता दिखाता है।
भारत में फिलहाल उसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई है।
11 सितंबर को भी पेट्रोल-डीजल के खुदरा भाव में कोई बड़ी नई बढ़ोतरी नहीं हुई।
लेकिन ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है, सऊदी सप्लाई तीन दशक से ज्यादा के निचले स्तर तक गिर चुकी है और पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा बरकरार है।
अगर यह स्थिति कुछ दिनों के बजाय कई सप्ताह या महीनों तक जारी रहती है तो भारत में भी तेल कंपनियों, आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ता जाएगा।
ऐसे में **पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का जोखिम जरूर बढ़ा है, लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कीमत कब और कितनी बढ़ेगी।**
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