बजाज ऑटो बनाम टेंपो कैसे टूटी सालों पुरानी दोस्ती और शुरू हुआ कॉरपोरेट संघर्ष
टेंपो विवाद से छिड़ी बड़ी जंग बजाज ऑटो और फिरोदिया परिवार की कहानी
नई दिल्ली : भारतीय ऑटोमोबाइल इतिहास में बजाज और फिरोदिया परिवार की कहानी कभी दोस्ती, साझेदारी और देशी उद्योग के विकास की मिसाल मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ यही रिश्ता एक बड़े कॉरपोरेट विवाद में बदल गया। बजाज ऑटो और टेंपो के बीच शुरू हुई कारोबारी खींचतान ने दोनों परिवारों के दशकों पुराने रिश्तों में दरार पैदा कर दी।
कैसे शुरू हुई थी दोस्ती?
आजादी के बाद भारत में सस्ते और आसान परिवहन साधनों की जरूरत बढ़ रही थी। इसी दौर में उद्योगपति एनके फिरोदिया ने जर्मनी की कंपनी Vidal & Sohn Tempo Werke के साथ मिलकर तीन पहिया वाहनों और छोटे व्यावसायिक वाहनों का कारोबार शुरू किया। दूसरी ओर बजाज समूह भी ऑटोमोबाइल क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा था। 1958 में बजाज और फिरोदिया समूह के बीच साझेदारी से Bajaj Tempo Motors की शुरुआत हुई। कंपनी का उद्देश्य भारत में टेंपो थ्री-व्हीलर और छोटे कमर्शियल वाहन बनाना था। यह साझेदारी लंबे समय तक सफल रही और "टेंपो" नाम देशभर में छोटे मालवाहक वाहनों की पहचान बन गया।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
समय के साथ दोनों समूहों की कारोबारी प्राथमिकताएं अलग होने लगीं। बजाज ऑटो जहां दोपहिया और तिपहिया वाहनों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा था, वहीं फिरोदिया समूह कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में विस्तार कर रहा था। असल टकराव तब बढ़ा जब कंपनी के नाम और ब्रांड पहचान को लेकर विवाद शुरू हुआ। जर्मनी की टेंपो कंपनी के स्वामित्व में बदलाव के बाद "Tempo" ब्रांड के इस्तेमाल और कंपनी के नाम में "Bajaj" बनाए रखने को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद सामने आए।
कोर्ट तक पहुंचा मामला
दोनों परिवारों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया। शेयर नियंत्रण, कंपनी प्रबंधन और अधिकारों को लेकर दोनों पक्षों ने अदालतों का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट के पुराने मामलों में भी दोनों समूहों के बीच बढ़ते तनाव का उल्लेख मिलता है।
Bajaj Tempo बना Force Motors
आखिरकार 2005 में कंपनी का नाम बदलकर Force Motors कर दिया गया। "Bajaj" और "Tempo" दोनों नाम कंपनी से हट गए। इसके बाद दोनों समूहों ने अपने-अपने रास्ते अलग कर लिए। हालांकि, कारोबारी रिश्ते खत्म होने के बाद भी दोनों परिवारों के बीच व्यक्तिगत संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए। 2014 में बजाज समूह ने Force Motors में अपनी हिस्सेदारी बेच दी, जिसके बाद दोनों कंपनियों का संबंध औपचारिक रूप से और कमजोर हो गया।
भारत के कॉरपोरेट इतिहास की बड़ी सीख
बजाज-फिरोदिया विवाद यह दिखाता है कि मजबूत साझेदारी भी बदलते कारोबारी हितों और ब्रांड अधिकारों के कारण संघर्ष में बदल सकती है। कभी देश में परिवहन क्रांति की नींव रखने वाली यह दोस्ती भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे चर्चित विवादों में शामिल हो गई।