आफत की बरसात | जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेबडेस्क।  इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम विकास और अपने सामने खड़ी चुनौतियों का हल निकालने की कोशिश के बावजूद प्राकृतिक आपदाओं के सामने आज भी मनुष्य लाचार है। लेकिन इतना जरूर है कि अगर सही वक्त पर सही दिशा में कोशिश की जाए तो आपदाओं को भले नहीं रोका जा सके, लेकिन उनसे बचाव जरूर किया जा सकता है। दुनिया भर में समुद्री तूफान से लेकर बाढ़ और एक हद तक भूकम्प से बचाव के बेहतर होते इंतजाम इसके सबूत हैं। लेकिन जहां व्यवस्थागत सक्रियता और आम लोगों के स्तर पर जागरूकता की कमी होती है, वहां प्रकृति का कहर दोहरी मार करता है। गुरुवार को बिहार और उत्तर प्रदेश में बरसात के साथ बिजली ने जैसा कहर बरपाया, वह इस बात का उदाहरण है कि प्रकृति की गति को तो हम नहीं रोक सकते, लेकिन हमारी लापरवाही भारी पैमाने पर जानमाल के नुकसान की वजह जरूर बन सकती है। गौरतलब है कि अकेले बिहार में आकाशीय बिजली गिरने से तिरासी लोगों की जान चली गई, वहीं उत्तर प्रदेश में चौबीस लोग मारे गए। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान एक तरह से नाहक ही चली गई, जिन्हें थोड़ी जागरूकता और सावधानी बरत कर बचाया जा सकता था।

अब तक यही माना जाता रहा है कि बरसात के वक्त कब बिजली गिर जाए, इसका अंदाजा किसी को नहीं हो पाता। लेकिन मौसम विज्ञान ने इस मसले पर काफी प्रगति की है और अगर इससे संबंधित पक्का आकलन नहीं भी हो पाता है तो इसके अनुमान आमतौर पर सही उतरते हैं। देश के लगभग सभी राज्यों में एक मौसम विज्ञान केंद्र है, जो मौसम से संबंधित जानकारी और पूर्वानुमान के बारे में सूचनाएं जारी करता है। सवाल है कि क्या केंद्र या राज्य स्तर पर मौजूद मौसम विज्ञान विभाग की ओर से बिहार या उत्तर प्रदेश सरकार को यह सूचित किया गया था कि अगले कुछ दिनों में मौसम कैसा रहने वाला है और बारिश का घनत्व या फिर बिजली गिरने की आशंका कितनी है? अगर मौसम विज्ञान विभाग की ओर से नियमित जारी होने वाली सूचना सरकार के पास पहुंची थी, तो आपदा प्रबंधन विभाग ने आम लोगों के लिए सावधानी बरतने से संबंधित कोई चेतावनी का प्रचार-प्रसार किया था? मौसम विज्ञान विभाग के स्तर पर किसी तरह की कोताही हुई या फिर आकलन और अनुमान की कसौटी में कोई कमी है तो उसमें सुधार के लिए क्या किया जा रहा है?

करीब चार साल पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिजली गिरने से लगातार मौतों को देखते हुए पहले ही संकेत हासिल करने वाले लाइटनिंग सेंसर के लिए सर्वे का निर्देश जारी किया था। वह किस स्थिति में काम कर रहा है और ग्रामीणों या साधारण लोगों के लिए कितना उपयोगी है? सही है कि प्रकृति में उतार-चढ़ाव की वजह से जो आपदाएं आती हैं, उनका सामना करना एक बड़ी चुनौती होती है, लेकिन व्यवस्थागत स्तर पर बचाव के इंतजाम से नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है। बारिश के दौरान बिजली गिरने से इतनी बड़ी तादाद में मौतें न हों, इसके लिए लोगों के बीच जागरूकता का प्रसार किया जा सकता है, आपात स्थिति में बचाव के लिए जरूरी तौर-तरीके के बारे में बताया जा सकता है, जगह-जगह ताड़ के पेड़ लगाने सहित तड़ित चालक लगाए जा सकते हैं। ऐसे कई उपाय हैं, जिनका प्रचार आम दिनों में किया जाना चाहिए, ताकि अचानक ही प्राकृतिक आपदा के समय लोग अपना हर संभव बचाव कर सकें। नुकसान के बाद मुआवजा और सहानुभूति राहत के कदम हैं, लेकिन अगर लोगों की जान बचाई जा सके तो उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।