कामयाबी और चुनौती

Success and challenge

जनता से रिश्ता वेबडेस्क – 

  • दो दशकों में भ्रष्टाचार और कालाधन भारत में बड़ा मुद्दा बना 
  • भारत को स्विस बैंक में खाता रखने वाले अपने नागरिकों का ब्योरा पहली बार मिला 
  • कालाधन विदेशी बैंकों में जमा करा रखा है

आखिरकार भारत को अपने कुछ नागरिकों के स्विस बैंक खातों तक पहुंचने में कामयाबी मिल गई। सरकार लंबे समय से इस कवायद में लगी थी कि स्विस खाताधारकों का ब्योरा पता चले और कालेधन के खिलाफ मुहिम जोर पकड़ सके। लेकिन ये सारी जानकारियां गोपनीय बनी रहेंगी, क्योंकि स्विस सरकार ने इस तरह की सूचनाओं का लेनदेन गोपनीयता की शर्तों के साथ किया है, किसी भी खाताधारक का नाम उजागर नहीं होगा। ऐसे में आमजन के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर सब गोपनीय ही बना रहेगा तो देश को उन लोगों के बारे में कैसे पता चलेगा जो कालेधन के कारोबार में लिप्त हैं और देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाने में लगे हैं। अभी जिन लोगों के खातों की खबर भारत को मिली है, उनमें ज्यादातर प्रवासी भारतीय और बड़े कारोबारी हैं। इनमें कई तो दूसरे देशों में बस चुके हैं। इसके अलावा करीब सौ ऐसे खातों की जानकारी भी दी है जो खाताधारकों ने पिछले साल बंद करा दिए थे, ताकि किसी भी कार्रवाई से बचा जा सके।

पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार और कालाधन भारत में बड़ा मुद्दा बना रहा है, खासतौर से चुनावों के दौरान सारे राजनीतिक दल इन दोनों मुद्दों का भरपूर इस्तेमाल करते रहे हैं। हर दल यह वादा करता रहा कि सत्ता में आते ही सबसे पहले उन लोगों को पकड़ा जाएगा जिन्होंने कालाधन विदेशी बैंकों में जमा करा रखा है, लेकिन आज तक पकड़ में कोई नहीं आया। अब भारत को स्विस बैंक से जो जानकारियां हासिल होनी शुरू हुई हैं, उनके लिए सरकार ने पिछले पांच साल में स्विटजरलैंड की सरकार पर काफी दबाव बनाया। अब सरकार के पास यह कहने को है कि स्विस बैंक में खाता रखने वालों का पता चल रहा है। ऐसे में कुछ खाताधारक पकड़े भी जा सकते हैं जिन्होंने मोटी कर चोरी की होगी और या नियम-कानूनों का उल्लंघन करके पैसा बाहर भेजा होगा।

हकीकत तो यह है कि ऐसा करने वालों की तादाद कोई इक्का-दुक्का नहीं, बल्कि हजारों में है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि सारे स्विस खाताधारक कालेधन और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। ऐसे भी खाताधारक हैं जिन्होंने पूरी नियम-प्रक्रियाओं के तहत खाते खोले होंगे। विदेशी खाताधारकों के खिलाफ कार्रवाई किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। भागे हुए आर्थिक अपराधियों को देश वापस लाने में ही सरकार के पसीने निकल रहे हैं, लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है तो ऐसे में स्विस बैंक के खाताधारकों में कितने और किस मामले में दोषी साबित हो पाएंगे, इसकी उम्मीद कम ही है, क्योंकि करार के तहत सब कुछ गोपनीय ही रखना है।

स्विटजरलैंड सरकार ने भारत को यह जानकारी ऑटोमैटिक एक्सचेंज ऑफ इन्फॉर्मेशन (एईओआइ) के तहत दी है। यह करार उसने दुनिया के पचहत्तर देशों के साथ कर रखा है। लेकिन भारत को इस करार के तहत स्विस बैंक में खाता रखने वाले अपने नागरिकों का ब्योरा पहली बार मिला है। इस करार का बड़ा फायदा इस रूप में देखा जाना चाहिए कि अब स्विस बैंक में खाता रखने वाले भारत सरकार की नजरों से बचे नहीं रह पाएंगे। हालांकि कालेधन की समस्या से निपट पाना आसान नहीं है, लेकिन एक सीमा तक इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश जरूर लगाया जा सकता है। इसके लिए आर्थिक अपराधों से निपटने वाले उस तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है, जिसकी लापरवाही और मिलीभगत से कालेधन के कारोबारी स्विस बैंक में पूंजी के पहाड़ खड़े करते रहे हैं।