आज से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू, सरकार के मुख्य एजेंडा में शामिल ये बिल । जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेबडेस्क।  संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है और इस सत्र में नागरिकता (संशोधन) विधयेक 2019 पर चर्चा उसी प्रकार सरकार के मुख्य एजेंडा में शामिल है, जिस प्रकार मानसून सत्र के दौरान जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को प्रमुखता दी थी. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व में केंद्र सरकार इस सत्र के दौरान नागरिकता (संशोधन) विधयेक को पास करवाना चाहेगी.

इन मुद्दों पर रहेगी नजर

केंद्र सरकार इस सत्र में करीब 35 विधेयकों को पारित कराना चाहती है. इन विधेयकों में विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 भी शामिल है. मौजूदा समय में संसद में 43 विधेयक लंबित हैं. संसद का यह सत्र 13 दिसंबर को समाप्त होगा. इसमें 20 बैठकें होंगी. इस सत्र में कई मुद्दों पर हंगामा होने के आसार हैं. आर्थिक सुस्ती, किसानों की समस्या, जेएनयू में विरोध प्रदर्शन, उन्नाव और लोकसभा सांसद फारूक अब्दुल्ला की हिरासत का मामला अहम है जिन पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है. कांग्रेस की मांग है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम को सत्र में हिस्सा लेने की इजाजत मिलनी चाहिए. मौजूदा सत्र में इस पर भी हंगामा होने के आसार हैं.

संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने जिन विधेयकों को पास करने को लेकर मंजूरी प्रदान की है उनकी सूची में नागरिकता (संशोधन) विधयेक 2019 को 16वें नंबर पर रखा गया है. देशभर में राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) को लेकर आगे कोई भी अभियान चलाने के लिए बीजेपी सरकार के लिए इस विधेयक को पास करवाना जरूरी है. इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान इस पर पूर्वोत्तर के राज्यों से कड़ा विरोध होने के मद्देनजर विधेयक को पास करवाने पर जोर नहीं दिया गया और पिछली लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने के साथ विधेयक खारिज हो गया.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर ज्यादा जोर

पिछली बार से ज्यादा बड़ा जनादेश (303 सीटों) के साथ बीजेपी अब दोबारा सत्ता में आई है, इसलिए सरकार इस बार नागरिकता (संशोधन) विधेयक को संसद में पास करवाना करवाना चाहेगी. इस विधेयक से मुस्लिम आबादी बहुल पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अप्रवासियों के लिए भारत की नागरिकता लेना आसान हो जाएगा. हालांकि विधेयक में इसे स्पष्ट नहीं किया गया है लेकिन इसके तहत ऐसा प्रावधान किया गया है कि इन देशों में अत्याचार सह रहे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं और इसमें मुस्लिम को शामिल नहीं किया गया है.

इस विधेयक में नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया. नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, भारत की नागरिकता के लिए आवेदक का पिछले 14 साल में 11 साल तक भारत में निवास करना जरूरी है लेकिन संशोधन में इन तीन देशों से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, और ईसाई समुदाय के लोगों के लिए इस 11 साल की अवधि को घटाकर छह साल कर दिया गया है.

एनआरसी मुद्दे पर भी बहस तेज

एनआरसी असम में एक लंबित मांग रही है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें पंजी से हटाया गया है लेकिन इसके लागू होने के बाद इसे देशभर में लागू करने की मांग तेज हो गई है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी चुनावी रैलियों के दौरान इस मसले को उठाया. बीते महीने अक्टूबर में अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में इस मसले को उठाया. हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी अपने चुनावी अभियान के दौरान प्रदेश में एनआरसी लाने का वादा किया. उधर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत इसको लेकर दबाव बनाए हुए हैं.

43 विधेयक संसद में लंबित

आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक चिटफंड (संशोधन) विधेयक 2019 उन 12 लंबित विधेयकों में शामिल है, जिन्हें संसद में चर्चा कर पारित करवाने के लिए सूचीबद्ध किया गया है. फिलहाल संसद में 43 विधेयक लंबित हैं, इनमें से 27 विधेयक पेश करने, विचार करने और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किए गए हैं जबकि सात विधेयक वापस लिए जाने हैं. केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण चिटफंड अधिनियम 1982 में संशोधन के लिए विधेयक लाएंगी जिस पर विचार करने के बाद उसे पारित करवाने की कोशिश की जाएगी. संसद के मानसूत्र सत्र में ही लोकसभा में पांच अगस्त को यह विधेयक पेश किया गया था.