तेल की कीमत | जनता से रिश्ता

    जनता से रिश्ता वेबडेस्क।  महामारी के इस दौर में जब उद्योग-धंधों के लंबे समय तक बंद रहने की वजह से अर्थव्यवस्था पर बुरी मार पड़ी है, महंगाई बढ़ी है, ऐसे में दिल्ली सरकार का डीजल पर से मूल्यवर्द्धित कर यानी वैट कम करने का फैसला लोगों को बड़ी राहत पहुंचा सकता है। केजरीवाल सरकार ने डीजल पर वैट तीस फीसद से घटा कर 16.75 फीसद कर दिया है, जिसके चलते अब दिल्ली में डीजल की कीमत करीब बयासी रुपए से घट कर तिहत्तर रुपए चौंसठ पैसे हो गई है। यानी आठ रुपए छत्तीस पैसे की कमी हुई है। इसे वैट में ऐतिहासिक कटौती माना जा रहा है। सरकारों को राजस्व का बड़ा हिस्सा तेल पर लगने वाले कर से आता है। जाहिर है, दिल्ली सरकार को इस फैसले से भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, मगर उसे विश्वास है कि इस बोझ को वह वहन कर लेगी और अर्थव्यवस्था को भी पटरी पर लाने में उसे कोई मुश्किल नहीं आएगी। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी थीं, कुंओं से कच्चा तेल उठाने वालों की तलाश हो रही थी, तब भी भारत में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही। इसे लेकर केंद्र सरकार पर अंगुलियां भी उठती रही हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार का यह कदम दूसरी सरकारों के लिए नजीर हो सकती है।

    डीजल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर सार्वजनिक परिवहन, उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों और कई सेवाओं पर पड़ता है। एक तरफ महंगाई की दर काबू में करने के प्रयास हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ तेल की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं, यह अपने आप में विरोधाभासी है। डीजल-पेट्रोल की कीमतों को संतुलित न कर पाने के पीछे बड़ा कारण है कि केंद्र और राज्य सरकारें इन पर लगने वाले करों और उपकरों में किसी प्रकार की कटौती करने के बजाय बढ़ोतरी ही करती देखी जाती हैं। जब पहली बार केंद्र में भाजपा सरकार आई थी तब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें काफी कम थीं। मगर सरकार ने इस तर्क पर पहले से निर्धारित करों को यथावत रखने के अलावा एक नया केंद्रीय कर और जोड़ दिया था कि उस पैसे से एक तेल भंडार बनाया जाएगा, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में विषम स्थितियां पैदा होने पर काम आएगा और तेल की कीमतें नहीं बढ़ानी पड़ेंगी। मगर हकीकत यह है कि न तो तेल भंडार बन सका है और न तेल की कीमतों में कभी कमी आई है। तबसे कर बढ़े ही हैं। डीजल और पेट्रोल पर राज्यों की तरफ से लगने वाला कर पहले ही बहुत अधिक है, जिसे लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केजरीवाल सरकार के फैसले का असर उनके राजस्व की कमाई पर निस्संदेह पड़ेगा, पर इससे सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई आदि के खर्चों में जो कमी आएगी, उससे बाजार में स्वाभाविक रूप से गति लौटेगी। इस तरह तेल पर की गई कर की कटौती की भरपाई दूसरी कारोबारी गतिविधियों के बढ़ने से हो सकती है। इसका सबसे बड़ा लाभ आम उपभोक्ता को होगा। अगर दूसरी राज्य सरकारें भी इस गणित को समझने का प्रयास करें, तो बढ़ती महंगाई को कम करने में मदद मिल सकती है। राजस्व जमा करने का अर्थ यह नहीं होता कि आम लोगों पर कर के ऊपर कर लादते जाओ। तमाम वस्तुओं पर जीएसटी लागू है, इसलिए राज्य सरकारें उन पर फैसला नहीं कर सकतीं, पर तेल पर लगने वाले मूल्य वर्द्धित कर में तो वे रियायत दे ही सकती हैं।