महाभारत कालीन वृक्ष कई राज छुपे हैं इनमें । जनता से रिश्ता

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। पारिजात हो या फिर अक्षय वट या हो बरबरान हिसार का वृक्ष। इन्‍हें महाभारत कालीन वृक्ष कहा जाता है। इनके साथ जुड़े हैं उस युग के कई सारे साक्ष्‍य। आइए जानते हैं अलग-अलग जगहों पर स्‍थापित इन अलग-अलग वृक्षों के साथ महाभारत की कौन सी कहानियां जुड़ी हैं।

पारिजात वृक्ष बाराबंकी, कुंतेश्वर महादेव

बाराबंकी के किंतूर गांव में स्‍थापित पारिजात का इतिहास माता कुंती और श्रीकृष्‍ण की पटरानी सत्‍यभामा से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पाण्‍डवों ने अपनी माता कुंती के साथ किंतूर के वन में ही निवास किया था। निवास के दौरान ही पाण्‍डवों ने वन में महादेव के मंदिर की स्‍थापना की। इसलिए इस स्‍थान पर स्‍थापित भोलेनाथ के मंदिर का नाम कुंतेश्‍वर महादेव हो गया। कहा जाता है कि माता कुंती ने अपने पुत्रों से शिव की पूजा के लिए पारिजात पुष्‍प लाने की बात कही थी। इसपर मां की इच्‍छा पूरी करने के लिए अर्जुन स्‍वर्ग से पारिजात के वृक्ष को लेकर आए और किंतूर में स्‍थापित किया। इसके अलावा श्रीकृष्‍ण की पटरानी सत्‍यभामा ने भी पारिजात पुष्‍प की मांग की थी तो कान्‍हा स्‍वर्ग से उनके लिए यह वृक्ष लेकर आए थे। पारिजात पुष्‍प अत्‍यंत सुंगधशाली होता है। लेकिन यह हमेशा रात्रि में ही खिलता है। सुबह होते ही यह मुरझा जाता है। इस वृक्ष की आयु 1 से 5 हजार वर्ष के बीच मानी गई है।

अक्षय वट, मोरना मुजफ्फरनगर

मुजफ्फरनगर के मोरना में स्‍थापित अक्षय वट की महत्ता का इतिहास ऋष‍ि व्‍यास पुत्र श्री शुकदेव मुनि महाराज से जुड़ा है। कथा मिलती है कि इसी स्‍थान पर और इसी वृक्ष के नीचे श्री शुकदेव जी ने हस्तिनापुर के तत्‍कालीन महाराजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाई थी। यह पाठ परीक्षित को ऋषि के गले में सांप डालने के बाद उनके पुत्र द्वारा मिला था। इसके मुताबिक तक्षक नाग के डसने से महाराजा परीक्ष‍ित की मृत्‍यु होने थी। शुकदेव जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण पान कराकर महाराज को शाप से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की प्राप्ति कराई थी। जैसा कि इसके नाम से ही स्‍पष्‍ट है अक्षय वट यानी कि इसका कभी क्षय न हो। तो बता दें कि पतझड़ आने पर भी इस वृक्ष के पत्‍ते कभी सूखते नहीं हैं। इसके अलावा इतने विशाल वृक्ष में किसी भी तरह की जटाएं नहीं हैं।

बंसीवट मथुरा, कन्‍हैया की बंसी की गूंजती है धुन

मथुरा में स्‍थापित बंसीवट की अपनी ही महिमा है। कथा मिलती है कि इसी वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण अपनी गाय चराने के लिए आते थे। इसके अलावा श्री राधारानी का श्रृंगार भी वह इसी वृक्ष के नीचे करते थे। मान्‍यता है कि आज भी इस वृक्ष से यदि कान लगाया जाए तो कन्‍हैया की बांसुरी की धुन सुनाई देती है। लेकिन इसके लिए आपका मन शांत और पूर्ण रूप से श्रीकृष्‍ण को समर्पित होना चाहिए।

अक्षय वट, कुरुक्षेत्र गीता का उपदेश

कुरुक्षेत्र से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ज्‍योतिसर। इसी स्‍थान पर है अक्षय वट। जिसके नीचे श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। मान्‍यता है कि जब अपनों के खिलाफ शस्‍त्र उठाने से अर्जुन ने इंकार कर दिया था तो श्रीकृष्‍ण ने इसी अक्षय वट के नीचे उन्‍हें गीता के 18 अध्‍याय सुनाए थे। यह वृक्ष ही महाभारत के दौरान गीता उपदेश का इकलौत साक्षी है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य भी इसी स्‍थान पर गीता के चिंतन के लिए आए थे।

बरबरान हिसार का पीपल वृक्ष

यहां एक पीपल का पेड़ है जिसके बारे में कहते हैं यह वही वृक्ष है जिसके पत्तों को बर्बरीक ने श्रीकृष्ण के कहने पर एक ही बाण से छेद दिया दिया था। बता दें कि आज भी नए निकलने वाले पत्ते में छेद होते हैं। कथा मिलती है कि जब महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था तो भीम के पौत्र और घटोत्‍कच के पुत्र बर्बरीक ने अपनी मां को यह वचन दिया कि जो भी कमजोर पक्ष होगा वह उनकी ओर से ही युद्ध में प्रतिभाग करेंगे। इसके लिए उन्‍होंने भोलेनाथ की आराधना की और तीन अजेय बाणों को प्राप्‍त किया। उधर श्रीकृष्‍ण को इस बात का पता चला तो ब्राह्मण वेष में बर्बरीक के पास पहुंचे और उनका मखौल उड़ाया कि महज तीन बाण के आधार पर वह महाभारत जैसा युद्ध कैसे जीत सकते हैं? तब बर्बरीक ने उन्‍हें अपने बाणों के बारे में बताया।

इसपर श्रीकृष्‍ण ने कहा कि यदि उनके बाण अजेय हैं तो वह पीपल के पत्‍तों में छेद करके दिखाएं। बर्बरीक ने बाण चलाया और सभी पत्‍तों में छेद हो गया लेकिन एक पत्‍ता जो श्रीकृष्‍ण के पीछे था वह बाकी रह गया था। तो बाण उनके चरणों के चक्‍कर काटने लगा। इसके बाद श्रीकृष्‍ण ने बर्बरीक से दान में उसका सिर मांग लिया। इस दान को सुनते ही वह समझ गया कि यह जो सामने हैं वह ब्राह्मण नहीं हो सकते तो बर्बरीक ने उनसे पूछा वह कौन हैं और श्रीकृष्‍ण ने उन्‍हें सब सच बताकर अपने विराट रूप के दर्शन कराए। इसके बाद बर्बरीक ने अपने सिर का दान तो कर दिया लेकिन महाभारत युद्ध देखने की इच्‍छा जाहिर की। इसपर कृष्‍ण ने बर्बरीक की महाभारत युद्ध को देखने की इच्‍छापूर्ति के लिए उसपर अमृत का छिड़काव करके एक पहाड़ी पर उसका सिर रख दिया ताकि वह पूरा महाभारत का युद्ध देख सके। यह घटना जिस जगह पर हुई वह वर्तमान में हरियाणा के हिसार जिले में है।