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विज्ञान

जानें शोधकर्ताओं ने अध्ययन में कैसे पता लगाया अचेतन ज्ञान और ईश्वर में आस्था का गहरा संबंध

Janta se Rishta
13 Sep 2020 11:16 AM GMT
जानें शोधकर्ताओं ने अध्ययन में कैसे पता लगाया अचेतन ज्ञान और ईश्वर में आस्था का गहरा संबंध
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जनता से रिश्ता वेबडेस्क | दुनिया में कई तरह की बैद्धिक क्षमताओं (Metal skills) वाले लोग होते हैं. कुछ तेजी से गणनाएं कर सकते हैं तो कुछ का अवलोकन बहुत बढ़िया होता है. विलक्षण बौद्धिक क्षमता या प्रतिभा वालों लोगों पर कई तरह के अध्ययन होते हैं. हाल ही में उन लोगों पर खास अध्ययन हुआ है जिनमें आगे की घटनाओं यानि भविष्य का पूर्वानुमान (preditct) लगाने की क्षमता होती हैं. अपने तरह के पहला और एकमात्र अध्ययन में पाया गया है कि ऐसे लोगों में ईश्वरीय सत्ता (Power of God) के प्रति विश्वास (Faith) अधिक होता है.

क्या होती है यह खास तरह की क्षमता
शोधकर्ताओं के अनुसार अचेतन रूप से जटिल स्वरूपों (Patterns) का पूर्वानुमान लगा सकने वाले इन लोगो में इस बात की संभावना ज्यादा होती है कि उनका भगवान के होने में ज्यादा मजबूत विश्वास हो. इस तरह से भविष्य का पूर्वानुमान लगा पाने की क्षमता को इम्प्लिसिट पैटर्न लर्निंग (Implicit Pattern Learning) कहा जाता है. ऐसे लोगों में यह विश्वास बहुत अधिक होता है कि कोई इश्वरीय शक्ति है जो इस ब्रह्माण्ड को चला रही है.

दो अलग संस्कृति-धर्म के समूब पर अध्ययन
जॉर्जटन यूनिवर्सिटी के न्यूरो वैज्ञानिकों यह अध्ययन किया है जो नेचर कम्यूनिकेशन जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इम्प्लिसिट पैटर्न लर्निंग (Implicit Pattern Learning) पर धार्मिक विश्वासों को लेकर पहली बार इस तरह का शोध हुआ है. इस अध्ययन में दो बहुत ही अलग तरह के सांस्कृति और धार्मिक समूहों को शामिल किया गया था जिसमें से एक अमेरिका और एक अफगानिस्तान का था.

क्या था इस अध्ययन का उद्देशय
इस अध्ययन का उद्देश्य था कि क्या इम्प्लिसिट पैटर्न लर्निंग विश्वास का आधार होता है और यदि होता है तो क्या अलग आस्थाओं और संस्कृतियों में भी वह संबंध मौजूद रहता है. शोधकर्ताओं ने वाकई पाया कि इम्प्लिसिट पैटर्न लर्निंग धर्म को समझने में एक अहम भूमिका निभाता है चाहे वह कोई भी धर्म क्यों ने हो.

यह प्रमुख नतीजा
इस अध्ययन के वरिष्ठ शोधकर्ता, जॉर्जटाउन में न्यूरोसाइंस के इंटरडिसिप्लिनरी प्रोग्राम और मनोविज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एडम ग्रीन ने बताया, “दुनिया भर के धर्मों में ‘दुनिया को व्यवस्थित रखने के लिए दखल देने वाले’ ईश्वर पर विश्वास मूल तत्व है.

यह शोध ईश्वर पर विश्वास को लेकर नहीं
ग्रीन ने कहा, “यह अध्ययन ईश्वर के अस्तित्व में होने या न होने को लेकर नहीं हैं. यह अध्ययन इस बात पर है कि हमारा मस्तिष्क कैसे और क्यों ईश्वर में विश्वास में करता है. हमारे अध्ययन का अनुमान कहता है कि जिन लोगों का मस्तिष्क अवचेतन रूप से पर्यावरण के पैटर्न को पकड़ने में अच्छा है, वे उन पैटर्न में एक उच्च शक्ति का हाथ होने को भी मानते हैं.”

बचपन के अनुभवों से गहरा संबंध
ग्रीन ने इसे समझाते हुए कहा, “इसमें बहुत दिलचस्प प्रेक्षण (observation) यह पाया गया कि बचपन और व्यस्कता में क्या हुआ था. आंकड़े सुझाते हैं कि यदि बच्चे अचेतन रूप से पर्यावरण से पैटर्न पकड़ते रहते हैं तो उनका विश्वास उम्र के साथ बढ़ने की संभावना होती है भले ही वह नास्तिक वातावरण में पल बढ़ रहे हों. इसी तरह से यदि वे अपने आसपास के पैटर्न को अवचेतन तौर पर पकड़ नहीं पाते हैं तो उनका विश्वास कम होगा भले ही वे धार्मिक माहौल में पले बढ़े ही क्यों न हों.

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शोध में यह भी पाया गया कि ऐसे लोगों का ईश्वर में विश्वास (Faith in God) का संबंध उनके धर्म से ज्यादा उनके बचपन (childhood) के अनुभवों से है.

क्या हुआ अध्ययन में
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को की इम्प्लिसिट पैटर्न लर्निंग को मापने किए प्रतिष्ठित संज्ञानात्मक परीक्षण (Cognitive Test) किया. इसके लिए प्रतिभागियों को एक कम्प्यूटर स्क्रीन पर अचानक दिखाई देकर गायब होने वाले बिंदुओं के क्रम को देखना था.उन्हें हर बिंदु के स्क्रीन पर आ जाने पर एक बटन दबना था. जिन प्रतिभागियों की मजबूत इम्प्लिसिट लर्निंग क्षमता थी वे अचानक दिखाई देने वाले बिंदुओं के पैटर्न का पूर्वानुमान लगाकर उनके आने से पहले ही सही बटन दबा देते थे. लेकिन ऐसे प्रतिभागियों को यह पता नहीं था कि यह उनके अचेतन मन के स्तर पर काम कर रहा है.

शोधकर्ताओं ने इसके बाद पाया कि बेहतर इम्प्लिसिट लर्निंग क्षमता वाले प्रतिभागी में ईश्वरीय सत्ता के प्रति अधिक विश्वास है भले ही उनका कोई भी धर्म हो. उन्हें लगता है कि यह अध्ययन इंसानी विश्वास को लेकर एक न्यूरोकॉग्निटिव आधार देता है. इस अध्ययन को इस तरह के विश्वास के आधार को पता लगाने की दिशा एक शुरूआती कदम भी माना जा सकता है.

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