जापान के शीर्ष प्रतिनिधि ने चीन से कहा- आरसीईपी में भारत शामिल नहीं तो हम भी नहीं… । जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेबडेस्क। भारत की गैर-मौजदूगी में जापान भी चीन की अगुवाई वाले  क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर सकता है. जापान के शीर्ष प्रतिनिधि ने संकेत दिए हैं कि अगर आरसीईपी में भारत शामिल नहीं होता है तो वह भी इससे पीछे हट सकता है. कुछ हफ्तों में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भी भारत के दौरे पर आने वाले हैं.

भारत ने इसी महीने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) से बाहर होने का ऐलान किया था. भारत ने इसके पीछे तर्क दिया था कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारतीय नागरिकों की आजीविका पर बुरा असर पड़ सकता है. चीन ने भारत के फैसले पर कहा था कि बाकी 15 देशों ने इस समझौते पर आगे बढ़ने का फैसला किया है और भारत बाद में चाहे तो इसमें शामिल हो सकता है.

जापान के व्यापार एवं वाणिज्य उपमंत्री हिडेकी माकीहारा ने ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कहा, फिलहाल हम उस (डील) पर विचार नहीं कर रहे हैं. हम अभी केवल भारत को समझौते में शामिल कराने के बारे में सोच रहे हैं. जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए भारत से संबंध मजबूत किए हैं. जापान और भारत के विदेश मंत्री व रक्षा मंत्री ने इसी सप्ताह ‘टू प्लस टू’ फॉर्मेट में पहली बैठक की. दोनों देश ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के साथ रणनीतिक वार्ता का भी हिस्सा है. चारों देशों की इस साझेदारी की चीन यह कहकर आलोचना करता रहा है कि इससे एक नए शीतयुद्ध दौर की शुरुआत हो सकती है.

समझौते में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को शामिल कराने को लेकर माकीहारा ने कहा, यह आर्थिक, राजनीतिक और खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए बेहद अर्थपूर्ण है. जापान इस समझौते में भारत को शामिल कराने के लिए प्रयास जारी रखेगा. माकीहारा ने कहा, शिंजो अबे के अगले महीने भारत दौरे पर व्यापारिक मंत्री हिरोशी काजीयामा भी साथ होंगे. आरसीईपी में शामिल होने वाले अन्य देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, न्यू जीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और वियतनाम भी शामिल हैं.

अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर में उलझा चीन सुस्त आर्थिक वृद्धि दर से निपटने के लिए आरसीईपी को तेजी से आगे बढ़ाना चाहता है. इस समझौते से चीन के लिए एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के दरवाजे खुल जाएंगे.