आपदा के सामने | जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेबडेस्क | प्राकृतिक आपदा पर काबू पाना मनुष्य के लिए बड़ी चुनौती है, पर इससे बचाव के कारगर इंतजाम की दरकार हमेशा रहती है। अम्फान चक्रवाती तूफान ने इस जरूरत को रेखांकित किया है। हालांकि इसके पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा और आंध्र प्रदेश के समुद्र तटीय इलाकों में तबाही मचाने की आशंका के मद्देनजर पहले से ही तैयारियां कर ली गई थीं। राष्ट्रीय आपदा राहत बल और सेना की टुकड़ियों को उन इलाकों में तैनात कर दिया गया था। लाखों लोगों को समुद्र तटीय इलाकों से निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था। मगर तूफान के दीघा तट पर टकराने के बाद पश्चिम बंगाल में जैसी तबाही मची उससे बचाव संभव नहीं था। इतनी तैयारियों के बावजूद सत्तर से ऊपर लोग मारे गए और कई घायल हो गए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा है कि जितना नुकसान कोरोना संक्रण से नहीं हुआ, उससे कहीं अधिक जान-माल का नुकसान अम्फान की वजह से हो गया। इससे उबरना आसान नहीं होगा। हालांकि चक्रवाती तूफान से तबाही का यह अनुभव नया नहीं है। पहले भी कई बार भारी नुकसान उठाना पड़ा है और उन अनुभवों को देखते हुए बचाव की तैयारियां भी बेहतर हुई हैं, फिर भी कुदरत हमेशा नई चुनौतियां पेश कर देती है।

प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिए अब कई तकनीकी और रणनीतिक तरीके ईजाद कर लिए गए हैं। तूफान आदि की सूचनाएं कई दिन पहले मिल जाती हैं, जिससे सतर्क रहा जा सकता है। प्रशासन मछुआरों, किसानों, समुद्र तटों पर कारोबार करने वालों को सावधान कर देता, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेज देता है। पर फिर भी भारी मात्रा में नुकसान हो ही जाता है। इसी तरह भूकम्प के समय होता है। तकनीकी सूचनाओं के जरिए भूकम्प संभावित इलाकों को चिह्नित तो कर लिया गया है, पृथ्वी के भीतर होने वाली हलचलों की आहट भी कुछ पहले ही मिल जाती है, पर भूकम्प आने पर होने वाले नुकसान को रोकना संभव नहीं हो पाता। इसकी बड़ी वजह भवन निर्माण की तकनीक, कारोबारी होड़ और बाजार का विस्तार है। अब पारंपरिक ढंग के भवन नहीं बनते, बहुमंजिला और कंक्रीट के भवनों को भूकम्प आदि के झटके तोड़ते हैं, तो जानमाल का बड़ा नुकसान होता है। फिर समुद्र तटीय इलाकों में सैर-सपाटे की गतिविधियां बढ़ने से वहां दुकानों, मोटेल, रेस्तरां आदि का जाल भी बिछता गया है। इनमें से कितने भवन भवन निर्माण संबंधी मानकों का पालन करते हुए बनते हैं, कहना मुश्किल है। चक्रवाती तूफान जैसी स्थितियों में उनमें से लोगों को निकाल कर सुरक्षित जगहों पर पहुंचा भी दिया जाए, तो माल का नुकसान भयावह होता है।

अम्फान की तबाही में बताया जा रहा है कि ज्यादातर लोगों की मौत बिजली के तार टूटने और उनकी चपेट में आने से हुई है। आजकल जब बिजलीघरों में इस तरह के यंत्र लगाए जाने लगे हैं कि वे तेज हवा का दबाव महसूस करते या कहीं तार टूटते ही स्वत: बिजली काट देते हैं, तब भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो हैरानी की बात है। फिर जब इस तूफान की सूचना पहले से थी, तो बिजली की आपूर्ति रोकी ही क्यों नहीं गई। दूसरी बात कि तूफान की गति का अंदाजा लगाने में भी कहीं चूक हुई। इस तबाही से उबरने में निस्संदेह वक्त लगेगा, पर एक बार फिर यह सबक जरूर लिया जाना चाहिए कि मनमाने व्यवहारों पर अंकुश लगाते हुए प्राकृतिक आपदा को झेलने की तैयारियां पहले से ही पुख्ता होनी चाहिए।

सोर्स – जनसत्ता