यहां भगवान गणेश जी की स्त्री अवतार में होते है पूजा – आराधना… | जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेबडेस्क। हिंदू धर्म में भगवान गणेश की विशेष पूजा कोई भी शुभ कार्य शुरू करने से पहले की जाती हैं। कुछ भक्त इन्हें लंबोदर के स्वरूप में पूजता है तो कोई गजानन के रूप में। भगवान गणेश के स्त्री अवतार की भी भक्त पूजा करते हैं। उनके स्त्री अवतार को भक्त विनायकी कहते हैं। देश-दुनिया में गणपति बप्पा के कई ऐसे मंदिर है, जहां उनकी अलग-अलग और अनोखी प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। इनमें भगवान गणेश के विनायकी रूप के बारे में कम ही लोग जानते हैं। काशी और उड़ीसा में गणेश के ऐसे ही स्वरूप की पूजा की जाती हैं। विनायकी देवी अपने एक हाथ में युद्ध परशु और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए नजर आती हैं।

कई जगह हैं भगवान गणेश के ऐसे मंदिर

Aadi Shakti - ~ψ~ ॥ ॐ आदि शक्ति ॥ ~ψ~ - Maa Gajanani ...

पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के पालननकर्ता भगवान विष्णु से लेकर इंद्र तक को किसी न किसी वजह से स्त्री रूप धारण करना पड़ा था। लेकिन इस बारे में कम ही लोग जानते हैं कि, भगवान गणेश को भी एक स्त्री रूर धारण करना पड़ा था। भगवान गणेश के विनायकी रूप की मूर्तियां देश के कई मंदिरों में देखने को मिलती है। इसमें तमिलनाडू स्थित चिदंबरम मंदिर, जबलपुर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर आदि शामिल हैं। उनका एक मंदिर बिलासपुर के पास भी बनाया गया है।

माता पार्वती ने दैवीय शक्तियों को बुलाया

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अपनी पत्नी को दैत्य से बचाने के लिए भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया और राक्षस के आरपार कर दिया। लेकिन वह राक्षस मरा नहीं, बल्कि जैसे ही उसे त्रिशूल लगा तो उसके रक्त की एक-एक बूंद एक राक्षसी ‘अंधकाÓ में बदलती चली गई। राक्षसी को हमेशा के लिए मारने के लिए उसके खून की बूंद को जमीन पर गिरने से रोकना था, जो संभव नहीं था। ऐसे में माता पार्वती को एक बात समझ में आई। वे जानती थीं कि हर एक दैवीय शक्ति के दो तत्व होते हैं। पहला पुरुष तत्व जो उसे मानसिक रूप से सक्षम बनाता है और दूसरा स्त्री तत्व, जो उसे शक्ति प्रदान करता है। इसलिए पार्वती जी ने उन सभी देवियों को आमंत्रित किया जो शक्ति का ही रूप हैं।

विनायकी रूप में प्रकट हुए गणेश

Vinakyaki or Ganeshani Devi. - Goddess Vidya

ऐसा करते हुए वहां हर दैवीय ताकत के स्त्री रूप आ गए, जिन्होंने राक्षस के खून को गिरने से पहले ही अपने भीतर समा लिया। फलस्वरूप अंधका का उत्पन्न होना कम हो गया। लेकिन, इस सबसे से भी अंधक के रक्त को खत्म करना संभव नहीं हो रहा था। अंत में भगवान गणेश जी अपने स्त्री रूप ‘विनायकीÓ में प्रकट हुए और उन्होंने अंधक का सारा रक्त पी लिया। इस प्रकार से देवताओं के लिए अंधका का सर्वनाश करना संभव हो सका। गणेश जी के विनायकी रूप को सबसे पहले 16वीं सदी में पहचाना गया।