संकट और चुनौती | जनता से रिश्ता

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जनता से रिश्ता वेब्डेस्क | पूर्णबंदी से भारत की अर्थव्यवस्था को तकरीबन बारह लाख करोड़ रुपए का नुकसान होने का जो अनुमान व्यक्त किया गया है, वह निश्चित रूप से चिंताजनक है। लेकिन देश इस वक्त जिस मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उसमें सबसे पहली प्राथमिकता लोगों की जान बचाने और उन्हें सुरक्षित रखने की है। इसलिए इस भारी-भरकम नुकसान को झेलने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता भी नहीं है। आइआइटी मुबंई के मानविकी और सामाजिक विज्ञान संकाय ने देशभर में अध्ययन करके यह बताया है कि कोरोना के कारण देश की अर्थव्यवस्था को कितना तगड़ा झटका लगा है और आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्थी की तस्वीर कैसी होगी। कोरोना विषाणु को फैलने से रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया भर के देशों को जो पहला परामर्श जारी किया था, वह पूर्णबंदी का ही था। पूर्णबंदी एक बेहद कठोर कदम है, लेकिन अपरिहार्य भी है। अगर भारत ने पूर्णबंदी नहीं की होती, तो आज तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह होती। जिन देशों में कोरोना से बड़ी संख्या में लोग मरे हैं और संक्रमितों की तादाद लाखों में है, उन देशों ने कोरोना पर डब्ल्यूएचओ की चेतावनी को शुरू में गंभीरता से नहीं लिया था और समय रहते पूर्णबंदी लागू नहीं की थी।

पूर्णबंदी ने अर्थव्यवस्था को जिस तरह से बेहाल किया है, उससे उबरने में अभी लंबा वक्त लगेगा। भारत में करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छोटे-मोटे कारोबारों पर ही टिकी है। बीस करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिनकी आजीविका गैर-कृषि कार्यों से चलती है। ये लोग छोटे और मझौले उद्योगों से जुड़े हैं। देश में लघु उद्योगों की संख्या सबसे ज्यादा है, जिनमें पांच से बीस-पचास लोग तक काम करते हैं। पर अब ये छोटे कामधंधे पूरी तरह से बंद हैं। कहीं कोई सामान बन नहीं रहा। जब सामान नहीं बनेगा तो बाजार में कैसे आएगा और कौन खरीदेगा। पूर्णबंदी के कड़े फैसले ने मांग और आपूर्ति के चक्र को तोड़ डाला है। ऐसे में लोग कहां जाएंगे, क्या कमाएंगे और क्या खाएंगे, यह बड़ा सवाल है। अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों की भागीदारी ज्यादा होती है। सरकार को करों का बड़ा हिस्सा इसी वर्ग से मिलता है। आइआइटी-मुंबई का अध्ययन बता रहा है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कानून (मनरेगा) और गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करने वालों को पूर्णबंदी के कारण एक लाख सोलह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान होगा। हकीकत यह है कि ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में लोगों के पास मनरेगा का काम भी नहीं है।

बड़े स्तर पर देखें तो अर्थव्यवस्था के कोयला, बिजली, इस्पात, ऊर्जा जैसे बड़े क्षेत्रों में भी उत्पादन ठप-सा है। कारखाने बंद होने की वजह से विनिर्माण गतिविधियां ठप हैं और इस कारण बिजली की मांग में भारी कमी आई है। दूसरी ओर, पर्यटन, होटल, रेस्तरां, मनोरंजन जैसे क्षेत्र हैं, जिनका पूरी तरह से दम निकल चुका है। भारत में पर्यटन से बड़ी आय होती है, जिसमें विदेशी पर्यटकों की हिस्सेदारी ज्यादा होती है। इन क्षेत्रों से जुड़े लोगों के पास अब काम नहीं है। लाखों लोगों की नौकरी चली गई है। होटल, पर्यटन जैसे क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं और इनसे कई तरह के रोजगार परोक्ष रूप से जुड़े हैं। प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें और ज्यादा हैं। भारत की चुनौतियां और समस्याएं दुनिया के मुकाबले ज्यादा गंभीर हैं। राहत के तात्कालिक पैकेजों के साथ ठोस और दूरगामी आर्थिक नीतियों की भी जरूरत है, तभी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकेगा।

सोर्स – जनसत्ता