छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़: गौठानों में गायों के मरने के पीछे की राम कहानी

Janta se Rishta
3 Sep 2020 6:12 AM GMT
छत्तीसगढ़: गौठानों में गायों के मरने के पीछे की राम कहानी
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  • आयोग अपने ही सरकार की योजना को कर रहा है मटियामेट
  • गौठान में पहुंचने से पहले ही गायों का चारा-पानी, कोटना तक गायब

जा़किर घुरसेना

रायपुर। कहावत है कि सांड़ों की लड़ाई में बागड़ का नुकसान होता है, वहीं हाल इस समय गौ सेवा आयोग की है। खुद तो काम नहीं कर रहे और न ही करने दे रहे। पंजीयक का अडिय़ल रवैया इस समय पूरे आयोग की सुर्खियों में बना हुआ है। गौठानों में छुटभैया नेताओं और सरपंचों ने अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर शासन को बदनाम करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। कमोवेश हर गांव की यहीं स्थिति है। भाजपा ने तो सीधे-सीधे गौठान में हो रहे अनियमितताओं के लिए अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है, जो कमीशनखोरी के चक्कर में गायों की उचित देखरेख, रखरखाव, दाना-पानी तक का इंतजाम नहीं कर पाए, जिसके परिणाम स्वरूप लगातार गौठानों में गायों की मरने की खबर आ रही है। प्रदेश सरकार के गौधन योजना की सारे देश में सराहना हुई है, वहीं आरएसएस ने गौसंरक्षण के तहत गोबर खरीदी, जैविक खाद बनाकर किसानों की अतिरिक्त आय कमाने की सरकार के कदम की प्रशंसा की है। यह योजना विशुद्ध रूप से ग्रामीणों को गांव में रोजगार उपलब्ध कराने और ग्रामीणों को जीवन में खुशहाली लाने की मंशा से भूपेश सरकार ने लागू की है। लेकिन इस योजना की दुर्गति राज्य गौ सेवा आयोग के अधिकारी ही कर रहे है। अधिकारी नहीं चाहते की सब कुछ अच्छा हो, ये गौठान के सांड हो गए है, जो तथाकथित छुटभैया नेताओं के साथ मिलकर घासभूमि चिन्हाकंन से लेकर दाना-पानी, दवाई सप्लाई करने वाले कारोबारियों पर कमीशन के लिए दबाव बनाकर योजना की महत्ता पर कुठाराघात कर रहे है। गौधन योजना से जुड़े ग्रामीण, सरपंच, पंच, चरवाहा, गोबर खरीदने और बेचने वालों को सींग मारकर गौठान से ही खदेड़ दे रहे है। जिसके कारण गौठान में रखे गायों को छत नसीब नहीं हुआ और समय पर चारा-पानी, खली-भूसा, चुनी नहीं मिल पाने के कारण गायें बीमार होकर असमय मौत की शिकार हो गई। सरकार की इस योजना में छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के पंजीयक की मनमानी से समस्त गौशालाओं के संचालक के साथ आयोग में पदस्थ समस्त अधिकारी कर्मचारी परेशान है। 19 अगस्त को क्रियान्वयन समिति के बैठक में अनुदान हेतु सहमति के बाद भी आज दिनांक तक गौशालाओं को अनुदान नहीं मिला है जिसके कारण बरसात में गौ-शालाओं के प्रबंधन में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। जबकि कृषि मंत्री ने पूर्व बैठक में स्पष्ट आदेश दिया था कि बरसात के पहले गौशाला को अनुदान दिए जाये और शेड एवं दाना-पानी की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि बरसात में अप्रिय स्थिति का सामना करना न पड़े। लेकिन लगता है कि आयोग में पदस्थ पंजीयक को मंत्री के निर्देश की कोई परवाह नहीं है । 25 अगस्त को पंजीयक ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए आयोग कार्यालय को 72 घंटे के लिए बंद कर दिया, जिससे गौशाला संचालक बहुत परेशान हुए। हद तो तब हो गई, जब कार्यालय बंद करने की अनुमति न संचालक से ली और न ही चेयरमेन से ली गयी। विधानसभा सत्र के बिना किसी की अनुमति के कार्यालय को बंद कर देना समझ से परे है । छत्तीसगढ़ सरकार पशुओं के बेहतर देखभाल के लिए गंभीर है एवं ग्राम पंचायतों में गौठानों का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन ऐसे गैर जिम्मेदार अधिकारियों के कारण अगर किसी गौशाला में अप्रिय घटना घटती है तो उससे न सिर्फ सरकार की बदनामी होगी साथ ही साथ गौवंश के पर्याप्त देखभाल के दावों पर भी प्रश्न चिन्ह लग जायेगा?

आयोग के कार्यालय में पदस्थ 3-4 कर्मचारी गंभीर रुप से बीमार थे। जिसके चलते कार्यालय बंद करना पड़ा इसके लिए चेयरमेन से अनुमति ली गई थी लेकिन संचालक से चर्चा नहीं हो पाई थी। गौ-शाला फंड का अनुदान जारी हो गया है इसके लिए ऑडिट रिपोर्ट जमा करना होता है। जिनका जमा हुआ है उनको अनुदान राशि वितरित कर दिया गया है जिन गौ-शालाओं को अनुदान नहीं मिला है वे ऑडिट रिपोर्ट जमा कर अनुदान राशि प्राप्त कर सकते हैं।
-डॉ. अंजना नायडू, पंजीयक,
गौ-सेवा आयोग छत्तीसगढ़

कई जिलों में तो गौठान अस्तित्व में ही नहीं

सरकार की इस महती योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पंजीयक और अधिकारियों पर है। गांव में गौठान के लिए कोटवार, पटवारी आरआई नापजोख स्केल लेकर घूम रहे है, उन्हें गौठान कई जिलों में घास भूमि ही मिली है। सरकार किसानों की फसल की सुरक्षा के साथ नगरीय सीमा क्षेत्र में आवारा घूमने वाले मवेशियों की व्यवस्थित रखरखाव करना है। जिससे अकाल मौत न हो। बीमार और दुर्घटना के शिकार मवेशियों को पर्याप्त उपचार की सुविधा के साथ चारा-पानी मिले। सबसे मजेदार बात यह है कि योजना पूरी तरह संचालित होने की बात कहीं जाती है जबकि सच यह है कि कई गांवों में गौठान ही अस्तित्व में नहीं आ पाया है। वहां आज भी गायें भगवान भरोसे चारा चर रही है।

गौमूत्र-गोबर खरीदी, जैविक खाद दूरदर्शन

सरकार की मंशा गौधन योजना यानी गौठान निर्माण को लेकर बहुत ही स्पष्ट है,गौमूत्र औषधि है, जंगल को विनाश से रोकने गोबर का अधिक से अधिक उपयोग के साथ खेती में गोबर से बने जैविक खाद का उपयोग कर उत्पादन बढ़ाने का उपक्रम है। जिन गांवों में गौठान नहीं बने है वहां ये सरकार योजना वहां के ग्रामीणों के लिए दूरदर्शन के समान है। न गोबर बेच पा रहे है और गौमूत्र, न ही खेती में जैविक खाद का उपयोग कर पा रहे है।

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