भीष्मपंचक व्रत: भगवान कृष्‍ण की कृपा पाने के लिए करें इन नियमों का पालन । जनता से रिश्ता

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। हिंदू धर्म में हर पर्व का खास महत्व होता है। त्योहारों और धार्मिक स्थिति से कार्तिक माह बहुत ही विशेष माना गया है। आज देवउठनी एकादशी है, आज ही भीष्म पंचक व्रत भी शुरू है। पुराणों तथा हिंदू धर्मग्रंथों में कार्तिक माह में ‘भीष्म पंचक’ व्रत का विशेष महत्व कहा गया है। इस साल यह व्रत 08 नवंबर से 12 नवंबर तक यानी आज से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक रखा जाएगा। इस व्रत को करके सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक का व्रत भीष्मपंचक व्रत कहलाता है।

निसंतान दंपत्तियों के लिए शुभ फलदायी

धार्मिक मान्यतानुसार, जो लोग पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करता है, उनके द्वारा सब प्रकार के शुभ कृत्यों का पालन हो जाता है। यह महापुण्यमय व्रत महापातकों का नाश करने के बराबर माना गया है। निःसंतान दंपत्ति इस व्रत को रखें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति अवश्य होगी। इसके अलावा इस व्रत को रखने से सुख-सम्मान में वृद्धि,  स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है और लंबी आयु की प्राप्ति भी होती है।

भीष्म महाराज की होती है विशेष पूजा

मां गंगा के पुत्र भीष्म पितामह पूर्व जन्म में वसु थे। अपने पिता की इच्छा पूर्ति के लिए आजन्म अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन का दृढ़ संकल्प करने के कारण उन्हें अपने पिता की तरफ से उनको इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था। इसलिए इन 5 दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए। साथ ही जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं वे इस दौरान भीष्मजी की विशेष पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

कार्तिक एकादशी से होती है शुरुआत

कार्तिक एकादशी के दिन बाणों की शय्या पर पड़े हुए भीष्मजी ने जल की याचना की थी। तब अर्जुन ने संकल्प कर भूमि पर बाण मारा तो गंगाजी की धार निकली और भीष्मजी के मुंह में आयी। उनकी प्यास मिटी और तन-मन-प्राण संतुष्ट हुए। इसलिए इस दिन को भगवान श्रीकृष्ण ने पर्व के रूप में घोषित करते हुए कहा कि ‘आज से लेकर पूर्णिमा तक जो अर्घ्यदान से भीष्मजी को तृप्त करेगा और इस भीष्मपंचक व्रत का पालन करेगा, उस पर मेरी सहज प्रसन्नता होगी।’

ऐसे हुई भीष्म पंचक व्रत की शुरुआत

महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर जिस समय भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में शरशैया पर शयन कर रहे थे। तक भगवान कृष्ण पांचो पांडवों को साथ लेकर उनके पास गए थे। उचित अवसर देखकर युधिष्ठर ने भीष्म पितामह से उपदेश देने का आग्रह किया। भीष्म जी ने पांच दिनों तक राज धर्म ,वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था। उनका उपदेश सुनकर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हुए और बोले, ‘पितामह! आपने शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिनों में जो धर्ममय उपदेश दिया है उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इसकी स्मृति में आपके नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित करता हूं । जो लोग इसे करेंगे वे जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष प्राप्त करेंगे।’

भीष्म पंचक व्रत में क्या करना चाहिए

इन पांच दिनों में अन्न का त्याग करें। कंदमूल, फल, दूध अथवा हविष्य (विहित सात्त्विक आहार जो यज्ञ के दिनों में किया जाता है) लें। यह व्रत 5 दिन तक चलता है इसलिए इन 5 दिनों में इस मंत्र से भीष्मजी के लिए तर्पण करना चाहिए,

‘सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने । भीष्मायैतद् ददाम्यघ्र्यमाजन्मब्रह्मचारिणे ।।’

इसका अर्थ है आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले परम पवित्र, सत्य-व्रतपरायण गंगानंदन महात्मा भीष्म को मैं यह अर्घ्य देता हूं ।

इस विधि से करें भीष्म पंचक व्रत

अर्घ्य के जल में थोड़ा सा कुमकुम, केवड़ा, पुष्प और पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) मिलाना शुभ फलदायी होता है। साथ ही जो लोग ब्रह्मचर्य के नियम का पालन करना चाहते हों उन्हें ‘मेरा ब्रह्मचर्य दृढ़ रहे, संयम दृढ़ रहे, मैं कामविकार से बचा रहूं’ ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए। इन 5 दिनों में अन्न की जगह कंदमूल, फल, दूध अथवा हविष्य (विहित सात्त्विक आहार जो यज्ञ के दिनों में किया जाता है) लेना चाहिए। इन दिनों में पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोझरण व गोबर-रस का मिश्रण) का सेवन लाभदायी होता है। पानी में थोड़ा-सा गोझरण डालकर स्नान करें तो वह रोग-दोषनाशक तथा पापनाशक माना जाता है ।

इस मंत्र से करें ‘पितामह’ की पूजा

वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतप्रवराय च । अपुत्राय ददाम्येतदुदकं भीष्मवर्मणे ।।
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च । अघ्र्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे ।

उपरोक्त मंत्र से जो भी व्यक्ति भीष्मजी के लिए अर्घ्यदान करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है। इस मंत्र के अनुसार, ‘जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्ररहित भीष्मवर्मा को मैं यह जल देता हूं । वसुओं के अवतार, शांतनु के पुत्र, आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूं।’