हड़ताल और सवाल

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- कोलकाता के एक अस्पताल में ग्यारह जून को डॉक्टरों के साथ मारपीट की घटना के बाद पश्चिम बंगाल और फिर देश भर में डॉक्टरों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएं जिस तरह से चरमरार्इं, उसकी कीमत सिर्फ मरीजों को चुकानी पड़ी है। न डॉक्टरों पर इसका कोई असर पड़ा है, न सरकारों के कान पर जूं रेंगी। फिलहाल राहत की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हड़ताली डॉक्टरों की मांगें मान लीं हैं और बंगाल सहित देश भर में डॉक्टर काम पर लौट आए हैं। लेकिन इस हड़ताल से जो सवाल निकले हैं, उनका जवाब न तो सरकारों के पास है, न डॉक्टरों के पास। इन सात दिनों के दौरान इलाज के अभाव में जिन मरीजों की जान गई, या जिन्हें गंभीर पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ा, उसका जिम्मेदार किसे माना जाए? डॉक्टरों को या फिर उस सरकारी तंत्र को जो चिकित्सा सेवाओं को सुचारु चला पाने और सात दिन में भी डॉक्टरों को काम पर लौटा पाने में नाकाम साबित हुआ? डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों का जो रवैया देखने को मिला है, वह उन्हें कठघरे में खड़ा करता है। वरना कितना भी गंभीर मामला क्यों न हो, सात दिन तक चिकित्सा सेवाओं का ठप रहना क्या नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ नहीं है?

अस्पतालकर्मियों और मरीजों के परिजनों के बीच मारपीट की घटनाएं आम हैं। शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब इस तरह के पांच-दस मामले सामने नहीं आते हों। इस तरह की घटनाएं दिल्ली के एम्स से लेकर जिले-कस्बे के अस्पतालों तक में होती रहती हैं। मरीजों-डॉक्टरों के बीच विवाद अचानक ही पैदा होते हैं। हर मरीज को अपनी स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर लगती है और ऐसे में वह डॉक्टर से अपेक्षा करता है कि उसे पहले देखा जाए। जब ऐसा नहीं होता तो विवाद खड़ा हो जाता है। कई बार डॉक्टरों और मरीजों का एक-दूसरे के प्रति व्यवहार आहत करने वाला होता है और झगड़ा खड़ा हो जाता है। मरीजों के प्रति डॉक्टरों की लापरवाही के किस्से भी किसी से छिपे नहीं हैं, कई बार तो डॉक्टरों की लापरवाही ही मरीज की जान ले लेती है। ऐसी घटनाएं तूल तब पकड़ती हैं जब अस्पताल प्रशासन इस तरह की समस्याओं का समाधान नहीं कर पाते। इसमें कोई दो राय नहीं कि ज्यादातर अस्पतालों में डॉक्टरों को मुश्किल हालात, सुविधाओं के अभाव और भारी दबाव में काम करना पड़ता है। ऐसे में जब मरीजों की न्यूनतम बेहतर इलाज की उम्मीदें भी पूरी नहीं हो पातीं तो लोगों का गुस्सा फूटता है और बड़े विवाद का रूप ले लेता है।

ड्यूटी के दौरान डॉक्टरों की सुरक्षा बड़ा और अहम मुद्दा है। लेकिन दुख की बात यह है कि डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए अब तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। अब जाकर केंद्र सरकार की नींद टूटी है और स्वास्थ्य मंत्री ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने पर फिर से विचार करने की बात कही है। अभी भी सिर्फ विचार की बात कही जा रही है। लेकिन ऐसा सुनने को नहीं मिला कि जल्द ही कोई ठोस समाधान निकलेगा। दो साल पहले भी डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने का मुद्दा उठा था, लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ नहीं हुआ, जबकि डॉक्टर-मरीजों के बीच विवाद की अनगिनत घटनाएं हो चुकी हैं। जाहिर है, ऐसे मामले सरकारों की प्राथमिकता में कहीं नहीं होते, बल्कि ऐसी घटनाओं की आड़ में राजनीतिक हित साधने की कोशिशें होने लगती हैं। इस तरह की घटनाओं को रफा-दफा करने की प्रवृत्ति ने ही कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं होने दिया जो डॉक्टरों के साथ-साथ मरीज की भी सुरक्षा सुनिचित करता हो।