सिनेमा ऑफ इम्तियाज़ अली: कैसे घुंघराले बालों वाले इस शख़्स ने प्रेम कहानियों को बदल डाला

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- इम्तियाज अली, मॉर्डन डे रोमांस किंग. वो डायरेक्टर जिनकी फ़िल्मों में अदाकाराएं ऑब्जेक्टीफ़ाई नहीं होती, जहां संगीत एक केरेक्टर की भूमिका निभाता है और जिनकी फ़िल्में हर बार कहानी कहने की हदें तोड़ती नज़र आती हैं. लेकिन उनकी फ़िल्मों मे ऐसा क्या खास है जो विश्व सिनेमा देखने वाली जनता भी उनकी लव स्टोरीज़ से कनेक्ट कर पाती हैं?हिंदी सिनेमा में कुछ दशक पीछे जाने पर साफ होता है कि बॉलीवुड में विलेन और प्रेम कहानियां की प्रासंगिकता बेहद ज़्यादा थी. कहानियों के किरदार बदलते थे लेकिन थीम अक्सर वहीं रहती थी. मसलन 60 के दशक के बाद से मूंछों वाले रौबदार ज़मींदार हों या बाद के दशकों में बिल्डर्स, ड्रग स्मगलर्स और नेता. इन सभी किरदारों का हाव-भाव आपको एक पल में एहसास करा देता था कि ये फ़िल्म के विलेन हैं और हीरो की एंट्री के साथ ही आप फ़िल्म के क्लाइमैक्स का ताना बाना दिमाग में बुन लेते थे.लव स्टोरीज़ भी इसी तरह समाज के साथ-साथ बदली. क्लास, कास्ट की परेशानियों के साथ-साथ घरवालों का दबाव कई लव स्टोरीज़ में दोहराया गया. लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में सब कुछ बदल रहा था. हीरो विलेन बन रहे थे, विलेन को ग्रेड शेड दिया जा रहा था. भारत के शहरी कामकाजी अपर क्लास वर्ग के लिए आज अपने प्यार को आसानी से चुन पाने की आज़ादी थी और मॉर्डन डे प्रेम कथाओं में विलेन की प्रासंगिकता भी खत्म हो चुकी थी.

प्रेम कहानियों में अब किसी प्रकार की उलझनें नहीं थी. बुनियादी तौर पर कहें तो इन कहानियों का बेसिक थीम का ढांचा ही गड़बड़झाला हो चला था. अब वो टकराव पैदा नहीं हो पा रहा था. इस बीच इम्तियाज अली की एंट्री होती है. वे भांप लेते हैं कि लव स्टोरी जॉनर में आगे बढ़ना है तो अंदरूनी द्वन्द पैदा करना होगा. करण जौहर से एकदम अलग ट्रीटमेंट वाले अली उनकी तरह ही भारत के वर्तमान अपर लिबरल क्लास को इस काम के लिए चुनते हैं.इम्तियाज़ अली कैरेक्टर के अंदर अंदरुनी द्वन्द पैदा करते हैं. वो शादी भी करना चाहता है लेकिन कमिटेड भी नहीं होना चाहता, वह उसके पास दौलत भी बेशुमार है लेकिन वो फ़िर भी खुश नहीं है. इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों में आपको ये अंदरुनी टकराव एक किरदार के रुप में नज़र आता, द्वन्द अब बाहरी नहीं बल्कि भीतरी हो चला था.उनकी फ़िल्मों के मेन लीड अनमने और अपनी ही अवचेतन दुनिया में रहने वाले होते हैं. दौड़भाग से भरी ज़िंदगी से दूर अपनी खुद की एक दुनिया में अपना सत्य तलाशने की पुरजोर कोशिशें. लेकिन जब-जब इस किरदार की ज़िंदगी में नायिका/ नायक की एंट्री होती तो कहानी में गहरी त्रासदी आने के साथ ही मुख्य किरदार अपनी राह तक पहुंच जाता.

जब वी मेट के शाहिद, हाइवे की आलिया से लेकर रॉकस्टार और तमाशा के रणबीर तक के सभी समाज़ के बने बनाए खाके से कहीं दूर निकल जाना चाहते हैं, वो इतने प्रीवीलेज्ड हैं कि ऐसा कर पाने में सक्षम हो लेकिन आत्म अन्वेषण रुपी केमिकल रिएक्शन को बढ़ावा देने के लिए इन्हें एक उत्प्रेरक यानि कैटेलिस्ट की ज़रुरत पड़ती है जो उन्हें फ़िल्म का दूसरा मुख्य किरदार ही आकर प्रदान करता था.इम्तियाज़ की पहली फ़िल्म ‘सोचा न था’ ढर्रेदार रोमांटिक फिल्मों के बीच हवा के झोंके की तरह थी. वही ‘जब वी मेट’ के साथ वो अपने कदम इंड्रस्टी में जमा चुके थे. ‘रॉकस्टार’ ने लोगों का ध्रुवीकरण किया वहीं तमाशा से लोगों को हेट नहीं थी, महज हल्की सी उत्सुकता थी लेकिन जिन्हें ये फ़िल्म पसंद आई, वो इसे एक शानदार फ़िलोसॉफ़िकल फ़िल्म बताने से नहीं चूके. इसने कई लोगों के स्ट्रॉन्ग इमोशंस को कुरेद उन्हें बाहर लाने की कोशिश की.सेल्फ़ डिस्कवरी की इस प्रक्रिया के इम्तियाज़ पोस्टर ब्वॉय बन चुके हैं. उनकी फ़िल्मों की सफ़लता का कारण भी यंग जनरेशन का उनकी फ़िल्मों से कनेक्ट ही है. आज के दौर में युवाओं का एक वर्ग इसी तरह की सेल्फ़ डिस्कवरी के बीच कुछ-कुछ छद्म शून्यवादी हो चला है, इम्तियाज़ की फ़िल्में ऐसे लोगों को भी एक नया नज़रिया भी प्रदान करती हैं. हालांकि लंबे समय बाद वे कुछ फिल्मों के फ्लॉप होने के साथ कई आलोचकों के निशाने पर आए हैं लेकिन ये साफ है आलोचकों की परवाह से इतर इम्तियाज अपना रूहानी अंदाज नहीं भूलेंगे.

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