व्यापार में तकरार

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- भारत और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध की आशंका जताई जा रही है। इसके चलते शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक पिछले तीन दिनों से लगातार नीचे का रुख किए हुए है। विदेशी निवेशक जबर्दस्त निकासी कर रहे हैं। दरअसल, दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध की आशंका अमेरिका के विकासशील देशों को दिए तरजीही राष्ट्र के दर्जे को वापस लेने के बाद से ही जताई जाने लगी। उन देशों में भारत भी शामिल है। उसके तरजीही राष्ट्र का दर्जा यानी जीएसपी हटाने से भारत से निर्यात की जाने वाली करमुक्त वस्तुओं पर भारी कर का भुगतान करना पड़ेगा। इससे भारतीय उत्पादकों पर बोझ बढ़ेगा। अमेरिकी फैसले के बाद भारत सरकार ने भी अमेरिका से भारत आने वाली अखरोट, बादाम, दाल जैसी अट्ठाईस वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ा दिया। भारत के इस फैसले को प्रतिक्रिया में उठाया कदम बताया जा रहा है। अमेरिका के फैसले से भारतीय एल्यूमिनियम, इस्पात आदि उत्पादों पर शुल्क बढ़ गया है, जिसके चलते इन क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों के सामने मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। इन्हीं क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई है।

अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए राष्ट्र कई बार सीमा श्ुल्क में दी जा रही छूटों को समाप्त करने का फैसला करते हैं। इसलिए अमेरिका का फैसला नया नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार में अमेरिकी युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का वादा किया था। रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए और सुरक्षा कारणों से उन्होंने अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में ही अनेक देशों के नागरिकों के नौकरी के लिए अमेरिका पहुंचने संबंधी नियमों को कड़ा कर दिया था। अब उन्होंने अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए तरजीही राष्ट्र की सूची में शामिल देशों से आने वाली वस्तुओं पर से कर की छूट समाप्त कर दी। इससे अमेरिका का राजस्व बढ़ेगा और वहां की वस्तुओं के लिए बाजार बढ़ेगा। मगर बड़े देश जब कुछ देशों को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देते हैं, तो उसके पीछे मकसद उन देशों को अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने में मदद करना और व्यापारिक संबंधों को मजबूत बनाना होता है। इस तरह अमेरिका ने भारत को जीएसपी से बाहर किया, तो यही माना गया कि वह भारत से अपने संबंधों को पहले जैसा मधुर नहीं बनाए रखना चाहता। इसलिए भारत का फैसला अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता कि उसने भी अमेरिका से आयात होने वाली कुछ वस्तुओं पर दी जा रही छूट को समाप्त कर दिया।

दरअसल, भारत तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था जरूर है, पर हकीकत यही है कि यह मजबूत स्थिति में नहीं है। विकास दर का रुख नीचे की तरफ है। ऐसे में सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें देखी जा रही हैं। इससे पार पाने के लिए सरकार ने दो समितियां गठित की हैं जो विकास दर में तेजी लाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने संबंधी उपायों पर विचार करेंगी। नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में भी प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस मामले में कंधे से कंधा मिला कर काम करने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में प्रयास करने पर जोर दिया। अगले पांच सालों में सरकार ने अर्थव्यवस्था को पांच हजार अरब डॉलर तक ले जाने का इरादा जताया है। इसलिए अमेरिकी वस्तुओं पर कर संबंधी छूट वापस लेने का फैसला अनुचित नहीं कहा जा सकता। शेयर बाजार की आशंका बहुत गंभीर नहीं मानी जानी चाहिए।

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