वरुण-आलिया पर भड़के फैंस बोले, सिर दर्द है ‘कलंक’

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सोनाक्षी सिन्हा, आदित्य रॉय कपूर और कुणाल खेमू स्टारर फिल्म ‘कलंक’ आज यानी बुधवार को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। ‘कलंक’ का ट्रेलर देखने के बाद तमाम दर्शकों को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार था, यही वजह है कि सोशल मीडिया पर फिल्म के रिलीज़ के बाद ही जमकर चर्चा शुरू हो गई है, लेकिन लगता है कि आलिया और वरूण की यह फिल्म लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। शायद यही वजह है कि फिल्म देखने के बाद सोशल मीडिया पर लोग अपनी निराशा जता रहे हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी है जिनको फिल्म का कहानी खूब पसंद आई है। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने फिल्म की कहानी के बारे में बात करते हुए लिखा, ‘यह कलंक नहीं, सर दर्द है। यह आलिया और वरूण की सबसे बकवास फिल्मों में से एक है।’ एक दूसरे यूजर ने लिखा, ‘मुझे यह नहीं समझ आ रहा कि वरूण धवन ने इस फिल्म के लिए हामी क्यों भरी।’ लोगों को फिल्म से इतनी ज्यादा निराशा हुई की एक यूजर ने लिखा, ‘यह मल्टीस्टारर फिल्म वाकई एक कलंक है। अपने रूपए बचाओ, यह फिल्म देखने की कोशिश भी मत करना।’ फिल्म को लेकर हमने कुछ लोगों से बात की, जिनमें एक महिला दर्शक ने कहा, ‘थोड़े पैसे कहानी, स्क्रीन राइटिंग और डायलॉग लिखने वालों पर खर्च करते तो अच्छा होता, फिल्म का सेट भी नकली लग रहा था।’ फिल्म देखकर बाहर निकले एक दर्शक ने गुस्से में कहा, ‘करण जौहर तो पागल हो गए हैं, उनको लगता है कि वह कुछ भी बनाएंगे तो लोगों को अच्छा लगेगा? जो आदमी तीन घंटे बैठ सकता है, वही फिल्म को जाकर देखे। कोई सेन्स ही नहीं है फिल्म में। बाहुबली बनाने की कोशिश की है, कुछ भी नहीं है, कोई दम नहीं है फिल्म में, माधुरी से अच्छी आलिया भट्ट हैं। मैं ही नहीं पूरी पब्लिक परेशान हो गई।’ एक यूजर ने लिखा, ‘कलंक का क्लाइमैक्स देखने के बाद आप अपने आप को थप्पड़ मारने लगेंगे।’ सोशल मीडिया में ‘कलंक’ को लेकर हो रही आलोचना से साफ है कि लोगों को करण जौहर का यह प्रयास बिल्कुल भी पसंद नहीं आया है। एक यूजर ने लिखा, ‘अनिद्रा रोग से पीड़ित हैं, तो कलंक आपके लिये एक असरदार दवा साबित हो सकती है।’ एक यूजर लिखते हैं, ‘मेरा विश्वास करें, यह फिल्म नहीं, बल्कि हेडेक है। यह वरुण और आलिया की पहली फ्लॉप फिल्म है।’

एक दर्शक ने हमसे बातचीत में फिल्म के लूप होल्स गिनवाते हुए कहा, ‘फिल्म को 1940 के समय में दिखाने के लिए, कुछ ऐसे शब्दों और डायलॉग का प्रयोग किया गया है, जो जबरदस्ती थोपे हुए लगते हैं। नजराना, तवायफ, नाजायज, कर्ज चुकाना जैसे शब्दों को बार-बार दोहराया गया है। फिल्म में बहुत से जम्प हैं, जिसकी वजह से किसी भी किरदार के बीच प्रॉपर रिलेशन नहीं बैठ पाया है। यह फिल्म आपकी आंखो को जरूर अच्छी लग सकती है, लेकिन आपके दिल में जरा सा भी असर नहीं करती है।’

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