रामधारी सिंह दिनकर के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी ये कविताएं

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | आज हिंदी के मशहूर कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्मदिन है. उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को सेमरिया में हुआ था. हिंदी पद्य साहित्य की महान कृति “रश्मिरथी” की सभी पंक्तियां, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 1950 में पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया के पुस्तकालय कक्ष में साहित्य साधना कर लिखीं थीं. तब पूर्णिया कॉलेज पूर्णिया के प्रथम प्राचार्य और हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार जनार्दन प्रसाद झा द्विज दिनकर के मित्र और मार्गदर्शी होते थे. दिनकर जी को पूर्णिया के शांत वातावरण और कवि द्विज जी से बड़ा लगाव था. इसी वजह से उन्होंने यहां रश्मिरथी की रचना की. पूर्णिया कॉलेज का यह पुस्तकालय दिनकर जी और उनकी रचना ‘रश्मिरथी’ की याद यहां के लोगों को हर दिन दिलाता है.उस समय पूर्णिया कॉलेज का पुस्तकालय कक्ष अंदर से एकांत और अंधेरा से घिरा रहता था लेकिन इसमें ऊपर बने रोशनदान से गिरती रौशनी हालात को शांत और सर्जक कक्ष बनाती थी. जिसका लाभ रामधारी सिंह दिनकर ने लिया. अब इस पुस्तकालय कक्ष को कॉलेज ने अपनी धरोहर घोषित कर उसका संरक्षण किया है. पूर्णिया के कई साहित्यकार बताते हैं कि दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे और वे अक्सर पूर्णिया के साहित्यिक मित्र द्विज जी से मिलने आते थे.कहा यह भी जाता है कि दिनकर जी ने आरम्भ में कर्ण के इतिहास को याद किया और अपने कवि मित्र से कर्ण के जीवन के आरंभ से अंत करुण पक्ष पर काव्य रचना करने की बात कही. जिसके बाद द्विज जी ने पूर्णिया कॉलेज के पुस्तकालय में उनका प्रवास कराया और रचना की शुरुआत हुई.कहा जाता है कि,33 दिनों में यह खंडकाव्य सूर्यपुत्र के नाम से रचा गया. बाद में जनार्दन प्रसाद झा द्विज ने इस खंडकाव्य का नाम एक बेहतर विशेषण और प्रतिमान के रूप में रश्मिरथी के नाम से देने का सुझाव दिनकर जी को दिया. जिसके बाद दिनकर जी ने अपने खंडकाव्य का नाम ‘रश्मिरथी’ कर दिया.

जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी.
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,

– तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी.
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास
अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास

.इस तरह पूर्णिया कॉलेज के पुस्तकालय और आजादी के बाद के दो हिन्दी साहित्यकारों के पारस्परिक प्रेम और सहयोग से हिन्दी साहित्य का कालजयी खंडकाव्य ‘रश्मिरथी’ सृजित हुआ.पूर्णिया कालेज का यह परिसर हिंदी साहित्य साधना का एक स्थापित केंद्र के रूप में है।
पूर्णिया प्रमंडल के साहित्यकार और पूर्णिया कॉलेज के हिन्दी विभाग के सभी सदस्य अपने इस ऐतिहासिक सृजनस्थल पर आज भी गौरवान्वित रहते हैं.

रश्मिरथी की स्मरणीय व् प्रसिद्ध पंक्तियाँ —
-हो गया पूर्ण अज्ञात वास,
पाडंव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,
नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,
कुछ और नया उत्साह लिये।

-वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

– दुर्योधन वह भी दे ना सका,आशिष समाज की ले न सका,

उलटे, हरि को बाँधने चला,जो था असाध्य, साधने चला।

जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर जाता है.