ये आठ देश चीनी कर्ज़ को ख़तरनाक क्यों मानने लगे

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:-चीन जिन देशों को कर्ज़ दे रहा है उन देशों को सतर्क रहने के लिए कहा जा रहा है. क्या चीन से मिलने वाला कर्ज़ वाक़ई ख़तरनाक होता है?पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने इसी साल मार्च महीने में कहा था कि अमरीका जिन देशों के साथ मिलकर काम करता है उन देशों को आत्मनिर्भर बनाता है जबकि चीन ख़ुद पर निर्भर बनाता है.टिलर्सन ने अपने अफ़्रीका दौरे पर कहा था, ”चीन अफ़्रीका को ख़ुद पर निर्भर होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. चीन जिन देशों को कर्ज़ देता है उसके अनुबंध अपारदर्शी होते हैं. वो कर्ज़ तबाह करने वाला होता है और भ्रष्ट गतिविधियों को बढ़ावा देता है.”चीन से पाकिस्तान, श्रीलंका, लाओस, जिबुती, मालदीव, मंगोलिया, मोन्टेनेग्रो और किर्गिस्तान को भी बेशुमार कर्ज़ मिले हैं.दुनिया भर के कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जिस तरह से श्रीलंका को कर्ज़ नहीं चुका पाने की स्थिति में हम्बनटोटा पोर्ट सौंपना पड़ा उसी तरह बाक़ी देशों को भी करना पड़ेगा.

  • चीन के क़र्ज़ तले दबे दुनिया के ये आठ देश

मलेशिया ने रद्द किए चार चीनी प्रोजेक्ट: फ़ाइनेंशियल की एक रिपोर्ट अनुसार गुरुवार को मलेशिया ने चीन समर्थित चार परियोजनाओं को रद्द कर दिया. ये चारों परियोजनाएं 23 अरब डॉलर की थीं.इसके साथ ही मलेशिया ने पूर्व प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में चीन की भूमिका की जांच का भी आदेश दिया है.चीन के इन परियोजनाओं के ज़रिए मलेशिया के पूर्वी तटीय रेल लिंक को दक्षिणी थाईलैंड और कुआलालंपुर से जोड़ने की योजना थी. इसके अलावा दो पाइपलाइन प्रोजेक्ट थे. इन परियोजनाओं में चीन की 85 फ़ीसदी रक़म लगनी थी.नजीब रज़ाक के चुनाव हारने और महातिर मोहम्मद के हाथों मलेशिया की कमान आने के बाद मलेशिया से चीन के रिश्तों में आमूलचूल बदलाव आए हैं.महातिर मोहम्मद को चीन विरोधी कहा जाता है. जानकार चीन के इन प्रोजेक्टों के रद्द होने के पीछे मलेशिया में सत्ता परिवर्तन बता रहे है.

  • वो डर जिससे नेपाल खुलकर चीन के साथ नहीं आ रहा
  • चीन के कारण पाकिस्तानी सेना मज़बूत हुई या कमज़ोर?

क्या मलेशिया में नई सरकार चीन विरोधी है| :20 जून को साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में छपे एक इंटरव्यू में महातिर मोहम्मद से सवाल किया गया था कि क्या वो चीन विरोधी हैं?इस सवाल के जवाब में महातिर मोहम्मद ने कहा था, ”कई ऐसी चीज़ें हुई हैं जो मलेशिया के हक़ में नहीं है. हम विदेशी निवेश का स्वागत करते हैं. ज़ाहिर है चीनी निवेश का भी स्वागत करते हैं. मसला यह है कि जब चीन से कोई समझौता होता है तो इसमें बेशुमार कर्ज़ तले दबने का डर रहता है.””जब चीन का ज़्यादा पैसा लगता है तो वो प्रोजेक्ट भी चीन के पास ही चला जाता है. चीनी कॉन्ट्रैक्टर कामगार भी अपना ही रखते हैं. सारे उपकरण भी चीन से ही आयात करने पड़ते है. यहां तक कि भुगतान भी मलेशिया में नहीं होता है. ऐसे में हमें कुछ भी हासिल नहीं होता है. इस तरह के निवेश को हम स्वीकार नहीं करेंगे.”महातिर ने इस इंटरव्यू में चीनी निवेश को अस्वीकार्य बताते हुए कहा, ”वो पूरे शहर को अपने हिसाब से बनाएंगे. ज़ाहिर है चीज़ें महंगी होंगी और मलेशियाई लोग ख़रीदने में असमर्थ होंगे. इन शहरों में हमारे लोग नहीं बल्कि विदेशी रहेंगे.””हम भी नहीं चाहते हैं कि कोई दूसरा देश मलेशिया में ज़मीन का बड़ा हिस्सा ख़रीदे और विदेशियों के लिए एक आभिजात्य टाइप की सिटी बनाए. मैं पूरी तरह से इसके ख़िलाफ़ हूं. ऐसा अरब के देशों, भारत और यूरोप से भी नहीं होने देंगे.”

नेपाल को भी डर: इसी तरह की बात नेपाल के बारे में कही जा रही है. चीन नेपाल के लिए रेलवे परियोजना पर काम करने वाला है. चीन पश्चिमी तिब्बत से नेपाल को जोड़ेगा. पिछले महीने नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन गए थे.चाइना डेली में छपी एक की रिपोर्ट के अनुसार चीन तिब्बत और नेपाल को रेलवे लाइन से जोड़ने पर राज़ी हो गया है. तिब्बत से यह रेल लाइन नेपाल की राजधानी काठमांडू तक जाएगी.कई विश्लेषकों का मानना है कि इस परियोजना में भी चीन का पैसा इतना होगा कि नेपाल अपने हिसाब से अनुबंध को आगे नहीं बढ़ा पाएगा और अंततः नेपाल भी चीनी कर्ज़ के बोझ तले दब जाएगा.

म्यांमार भी चीन प्रोजेक्ट को करेगा छोटा: चीनी कर्ज़ का डर म्यांमार को भी सता रहा है. मंगलवार को निक्केई एशियन रिव्यू को दिए इंटरव्यू में म्यांमार के वित्त एवं योजना मंत्री सोई विन ने कहा कि चीन उनके देश में जो विशेष आर्थिक क्षेत्र बना रहा है उसके आकार में कटौती होगी.उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों से उन्हें सबक मिला है कि ज़्यादा कर्ज़ कई बार अच्छा नहीं होता है.म्यांमार के क्याऊकप्यु में चीन विशेष आर्थिक क्षेत्र बानाने वाला है. यह हिन्द महासागर में है और 10 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट है. यह प्रोजेक्ट चीन के वन बेल्ट वन रोड का हिस्सा है.2015 में चीन की सरकारी निवेश कंपनी को म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में एसइज़ेड विकसित करने का ठेका मिला था. इस विशेष आर्थिक क्षेत्र को तेल और प्राकृतिक गैस की पाइपलाइन से चीनी प्रांत युन्नान से जोड़ना है.इसके साथ ही एक विशाल बंदरगाह बनाने की भी बात है और पास में ही 1000 हेक्टेयर में इंडस्ट्रियल पार्क बनना है.म्यांमार को लग रहा है कि कहीं उसकी हालत भी श्रीलंका की तरह ना हो जाए. सोई विन ने कहा कि उनका उद्देश्य अच्छे राजस्व को लेकर है. उन्होंने कहा कि आख़िर में कर्ज़ चुकाना ही है इसलिए अनावश्यक खर्चों में कटौती करेंगे.2017 के अंत तक म्यांमार पर विदेशी कर्ज़ 9.6 अरब डॉलर था. इनमें से 40 फ़ीसदी कर्ज़ चीन का है. सोई ने कहा कि किसी एक देश का 40 फ़ीसदी कर्ज़ किसी भी लिहाज से अच्छा नहीं है.2017 के दिसंबर महीने में स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच म्यांमार-चाइना इकनॉमिक कॉरिडोर के बीच सहमति बनी थी. इसमें रेलवे और रोड निर्माण भी शामिल हैं. हालांकि म्यांमार को डर है कि कहीं वो और कर्ज़ के जाल में ना उलझ जाए.

पाकिस्तान में भी डर: पाकिस्तान में चीन जिस ग्वादर पोर्ट पर काम कर रहा है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. चीन पाकिस्तान में 55 अरब डॉलर की रक़म अलग-अलग परियोजनाओं में ख़र्च कर रहा है.पाकिस्तान के बारे में कहा जा रहा है कि दबाव के बावजूद ग्वादर पोर्ट प्रोजेक्ट के अनुबंधों को सार्वजनिक नहीं किया गया है. विश्लेषकों का मानना है कि इस रक़म का बड़ा हिस्सा कर्ज़ के तौर पर है.पाकिस्तान में भी आशंका जतायी जा रही है कि श्रीलंका के हम्बनटोटा की राह पर कहीं उसे भी ग्वादर समेत अन्य संपत्तियों का मालिकाना हक़ चीन को नहीं सौंपना पड़े. ग्वादर में निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर 40 सालों का समझौता है.चीन का इसके राजस्व पर 91 फ़ीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फ़ीसदी मिलेगा. ज़ाहिर है अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के पास 40 सालों तक ग्वादर पर नियंत्रण में नहीं रहेगा.