मोहिनी एकादशी 2019 :जानें इस एकादशी की महिमा, व्रत पूजन विधि और मुहूर्त

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस बार यह तिथि 15 मई को है। मोहिनी एकादशी के बारे में कुछ लोगों का मानना है कि इस दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था इसलिए इसका नाम मोहिनी एकादशी पड़। जबकि इस विचार का उल्लेख किसी पुराण और धर्मग्रंथ में नहीं मिलता है। भगवान विष्णु ने कई बार मोहिनी का अवतार लिया है। इनमें भस्मासुर से भगवान शिव को बचाने के लिए, समुद्र मंथन के बाद अमृत बांटने के लिए और इरावन से विवाह करने के लिए भी मोहिनी रूप धरने का वर्णन मिलता है।

स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया इसका महत्व

पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि युधिष्ठिर ने कान्हा से पूछा, भगवन! वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व और फल क्या है? तब श्रीकृष्ण भगवान राम को याद करते हुए कहते हैं कि यही सवाल त्रेतायुग में भगवान राम ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा था।

मोहिनी एकादशी व्रत की कथा

सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम की सुंदर नगरी है। वहां धृतिमान नाम के राजा का शासन था। धृतिमान चंद्र वंश में उत्पन्न हुए थे और सदैव सत्य वचन ही बोला करते थे। उनके नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य रहता था, जो संपन्न और सुखी परिवार से आता था। वह बड़े चाव से समाज सेवा किया करता था। लोगों की सेवा के लिए जल के स्त्रोत जैसे, नल, तालाब, पोखर बनवाता। मार्ग के किनारे वृक्ष लगवाता। साथ ही वह भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, हर समय उनकी भक्ति में लीन रहता।धनपाल के पांच पुत्र थे, सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत और धृष्टबुद्धि। धनपाल का सबसे छोटा और पांचवां पुत्र धृष्टबुद्धि हमेशा पाप कर्म ही किया करता। साथ ही जुआ खेलता और मदिरापान करता। एक दिन वह एक नगरवधू (वेश्या) के गले में बाहें डालकर घाट के चौराहे पर घूमता देखा गया। बेटे के इस कृत्य से परेशान होकर धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया। घर से निकाले जाने के कारण उसके पास खाने के लिए भी कुछ नहीं था व्यसन करना तो दूर की बात है। वह दर-दर भटक रहा था।

एक दिन उसका कोई पुण्य उदय हुआ और वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पर जा पहुंचा। यह वैशाख मास की घटना है। कौण्डिन्य ऋषि उस समय गंगास्नान के लिए गए हुए थे। जब वह आश्रम में लौटे तो पश्चताप के भार से भरा हुआ धृष्टबुद्धि उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए उनसे ऐसे व्रत के बारे में पूछने लगा, जो उसके सभी पाप कर्मों का क्षय कर सके। तब महर्षि ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी दरिद्रता दूर हुई और मृत्यु के बाद उसे वैकुंठ लोक में स्थान मिला।

एकादशी तिथि का आरंभ- 14 तारीख की दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से।

एकादशी का समापन- 15 तारीख की सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक।

नोटः 15 तारीख को उदया तिथि के अनुसार एकादशी का व्रत होने से अगले दिन व्रत पूर्ण माना जाएगा। एकदशी का परायण द्वादशी तिथि में होता है जो 16 तारीख को 8 बजकर 15 मिनट पर समाप्त हो रहा है।

ऐसे करें व्रत और पूजन

एकादशी का व्रत करने के लिए ब्रह्ममुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करके स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद धूप, दीप, तुलसी, अक्षत, कलश, नारियल और मेवे से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात सूर्यदेव को जल अर्पित करना चाहिए। एकादशी व्रथ में निर्जल व्रत रखने का विधान है लेकिन जो लोग निर्जल व्रत नहीं रख सकते वह फलाहार करके भी व्रत कर सकते हैं।एकादशी का व्रत करनेवालों को रात में सोना नहीं चाहिए बल्कि रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन में समय लगाना चाहिए। सुबह के समय तुलसी को जल अर्पित करें। इसके बाद शाम के समय तुलसी के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं। एकादशी का परायण करने से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा देना चाहिए।पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी व्रत की कथा पढ़ने औऱ सुनने मात्र से हजारों गायों के दान का पुण्य प्राप्त होता है। जबकि व्रत करके कथा सुनने से उत्तम लोक की प्राप्ति होती है।

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