बॉलीवुड की वो थ्रिलर फिल्में जिन्हें देखकर आपकी रूह कांप जाएगी

जनता से रिश्ता वेबडेस्क :-  तापसी पन्नू की साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म गेम ओवर का ट्रेलर रिलीज़ हो गया है और इस ट्रेलर को दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. रोमांटिक कॉमेडी जैसे मेनस्ट्रीम जॉनर से अलग साइकोलॉजिकल थ्रिलर्स को एक ऐसा जॉनर कहा जा सकता है जिसमें दर्शक अंत तक अपनी सीट पर बंधे रहते हैं और एक आम फिल्म से अलग इस जॉनर की फिल्में दर्शकों को एक नए किस्म के सिनेमैटिक अनुभव से लबरेज कर देती हैं. जानिए भारत की ऐसी ही कुछ थ्रिलर्स के बारे में, जिन्हें देखने पर कुछ घंटें आप इन फिल्मों के प्रभाव में जरूर रहेंगे.अनुराग कश्यप की ये फिल्म भारत की बेहतरीन साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म में शुमार हैं. ये फिल्म एक स्ट्रग्लिंग एक्टर की कहानी है जिसकी 10 साल की बेटी गाड़ी में अपने पिता का इंतजार करते हुए गायब हो जाती है. डिप्रेशन से जूझती मां, अपनी ही इनसिक्योरिटीज़ से जूझता एक पुलिसवाला, संघर्ष करता एक्टर और उसका दोस्त, फिल्म में ऐसे कई कैरेक्टर्स हैं जिन्होंने शानदार काम किया है. इस फिल्म के लिए कश्यप ने खास तौर पर पुलिस की इंटेरोगेशन को लेकर बेहद रियलिस्टक बनाने की कोशिश की थी. ये फिल्म दर्शकों को अंत तक बांध कर रखती है और फिल्म का क्लाइमैक्स परेशान कर देना वाला है.

इस फिल्म को श्रीराम राघवन ने डायरेक्ट किया है. ये कहानी एक ऐसी महिला के बारे में है जो यूं तो चूहों से भी काफी डरती है लेकिन एक शख्स के संपर्क में आने के बाद कुछ ऐसी स्थितियां बनती हैं कि महिला को बिना किसी गलती के जेल जाना पड़ता है. जेल में जाकर इस महिला की ज़िंदगी बदल जाती है और बाहर आने के बाद उसका केवल एक ही मकसद होता है. इस फिल्म को सैफ अली खान और उर्मिला के करियर की सबसे अंडररेटेड फिल्म कहा जा सकता है क्योंकि इस फिल्म ने खास कमाई नहीं की थी लेकिन आज के दौर में ये फिल्म कल्ट क्लासिक बन चुकी है.कुछ त्रासदी भरी घटनाओं की वजह से सत्यवीर सिंह रांधावा जो पेशे से जूनियर इंजीनियर है, उसे राजस्थान के एक छोटे से गांव में डिटेक्टिव की भूमिका निभानी पड़ती है. हालांकि, यहां उसे झूठ, लूट और मर्डर जैसी चीज़ों का सामना करना पड़ता है. देव डी के बाद इस फिल्म को भी अभय देओल की बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया जा सकता है. इस फिल्म में भी नवाजुद्दीन एक कैमियो में नज़र आए थे.

निशिकांत कामत द्वारा डायरेक्ट की गई इस फिल्म में अजय देवगन, श्रिया सरन और तब्बू ने अहम भूमिका निभाई है. ये एक ऐसे शख्स की कहानी है जो न्याय और सत्य में विश्वास रखता है लेकिन किसी कारणवश उसे अपनी फैमिली को बचाने के लिए एक जटिल झूठ बोलना पड़ता है. दक्षिण फिल्म का रीमेक ये फिल्म किसी भी पल बोर नहीं करती और अजय देवगन और तब्बू के परफॉरमेंस के चलते ये उनकी सबसे बेहतरीन थ्रिलर फिल्मों में शुमार है.इस फिल्म को रामगोपाल वर्मा ने डायरेक्ट किया था. तीन हफ्तों से भी कम समय में शूट हुई इस फिल्म में एक लड़की अपने घर में अकेली है और अपने पैरेंट्स का इंतजार कर रही है. हालांकि फिल्म में ट्विस्ट तब आता है जब एक शख्स यानि मनोज वाजपेई इस लड़की के घर में घुसने का प्रयत्न करने लगता है. फिल्म के क्लाइमैक्स में इस्तेमाल किया गया ट्विस्ट दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देने की क्षमता रखता है. इस फिल्म को आज भी देश की बेहतरीन साइकोलॉजिकल थ्रिलर्स में शुमार किया जाता है.

नसीरूद्दीन शाह के बेटे इमाद शाह ने इस फिल्म में लीड भूमिका निभाई थी. ये फिल्म एक ऐसे प्रोफेसर के बारे में है जो ये मानता है कि हर चीज़ को साइंस के जरिए समझाया जा सकता है. इमाद शाह की इस फिल्म को रिलीज़ होने पर खास चर्चा नहीं मिली थी लेकिन समय के साथ इस फिल्म की फैन फॉलोइंग में बढ़ोतरी हुई है और साइंस फिक्शन और थ्रिलर फिल्मों के फैन्स के लिए ‘404 : एरर नॉट फाउंड’ कल्ट क्लासिक फिल्म हो चुकी है.ये फिल्म एक ऐसे कपल के बारे में है जो फिजी आइलैंड में पेड वेकेशन जीतने में कामयाब रहता है. हालांकि कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब इन्हें एक ऐसे गेम शो में हिस्सा लेने को कहा जाता है जिसमें आपको सच बोलना ही होगा. खास बात ये है कि इस फिल्म के लीड एक्टर राजीव खंडेलवाल इसी फिल्म की थीम पर रियैल्टी शो ‘सच का सामना’ को होस्ट भी कर चुके हैं.

इस फिल्म में मनोहर(माधवन) नाम का एक शख़्स अपनी फैमिली के साथ नए अपॉर्टमेंट में शिफ्ट हुआ है. ये परिवार एक टीवी सीरियल से काफी प्रभावित है और इस सीरियल को काफी मन लगा कर देखता है. फिल्म में ट्विस्ट तब आता है जब इस सीरियल में घट रही घटनाएं इस परिवार के साथ असल जिंदगी में भी गुजरने लगती है जिसके चलते इस फैमिली को एक अजीबोगरीब त्रासदी का सामना करना पड़ता हैनवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म रमन राघव 2.0 जैसी फिल्म में भी एक साइको कैरेक्टर का रोल प्ले कर चुके हैं लेकिन उनकी ये फिल्म भी एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर के लिहाज से काफी सशक्त फिल्म है. ये एक ऐसे पुलिसवाले के बारे में है जो अपना पहला असाइनमेंट संभालने निकला है. उसे एक बार ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जहां या तो वो एक शख्स को शूट कर सकता है या नहीं. इस पुलिसवाले की ये दुविधा ही फिल्म का प्लॉट है.

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