पाकिस्तान की उपस्थिति की क्या वैधानिकता है,पीओके

 जनता से रिश्ता वेबडेस्क –  एक ओर पाकिस्तान  जोर-शोर  से कश्मीर और उसके निवासियों के अधिकारों की तथाकथित कटौती और भारत द्वारा उन पर लादी गई बंदिशों का रोना विश्व भर में रो रहा है. दूसरी ओर, इससे एकदम अलग चीजें पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से हड़पे गए कश्मीर  जिसे वह ‘आज़ाद कश्मीर’ भी कहता है, में दिखाई दे रही हैं. नाम से एकदम विपरीत आज़ाद कश्मीर में निवासियों को लेशमात्र की आज़ादी भी सुलभ नहीं है और यह क्षेत्र पाकिस्तान का उपनिवेश बन कर रह गया है.अभी हाल में भारत द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को जम्मू कश्मीर से हटाने के बाद पाकिस्तान द्वारा छेड़े गए दुष्प्रचार के मद्देनज़र विश्व भर की मीडिया का ध्यान इस ओर आकर्षित किया. जिन्हें किसी भी दृष्टिकोण से भारत पक्षीय नहीं कहा जा सकता, पाकिस्तान के कब्जाए गए इस क्षेत्र में आज़ादी की मांग के बुलंद किए जाने को महत्वपूर्ण स्थान दे रहे हैं. समाचार पत्र लिखता है कि जिन्हें हाल के दिनों में आज़ाद जम्मू और कश्मीर तक पहुंच उपलब्ध कराई गई थी, जो लगभग दुर्लभ सी है. अखबार ने यह भी लिखा है कि उसे वहां आज़ादी की बढती मांग और इसकी प्रतिक्रया में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों का कठोर रुख देखने को मिला है.

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की स्थिति
पाकिस्तान के कब्‍जे वाला कश्मीर वह क्षेत्र है जो पाकिस्तान द्वारा कबायली हमले की आड़ में अपने सैन्य ऑपरेशन द्वारा 1947 में ही अवैध रूप से हथिया लिया गया था. 90,972 वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्र पाकिस्तान द्वारा दो भागों में बांट दिया गया. तथाकथित आज़ाद कश्मीर 13, 297 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला हिस्सा है.गिलगित बाल्टिस्तान जो अपेक्षाकृत विरल आबादी वाला भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्र है, का क्षेत्रफल 72,495 वर्ग किलोमीटर है.न्य तानाशाह जनरल अयूब खान ने चीन के साथ सम्बन्ध सुधारने की गहन कोशिशें शुरू कीं. उसके तहत सद्भाव बढ़ाने वाले प्रयासों के तहत चीन द्वारा लम्बे समय से निशाने पर रखा गया ट्रांस्काराकोरम ट्रैक्ट, जिसे शक्स्गाम वैली भी कहा जाता है, और जिसका क्षेत्रफल 5180 वर्ग किलोमीटर है, 2 मार्च 1962 को एक संधि द्वारा चीन को अंतरित कर दिया गया.यह क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है और भारत की सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है. आज पाकिस्तान और चीन जिस चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर जोर शोर से काम कर रहे हैं, वह पाकिस्तान से चीन के अंदर काश्गर तक इसी कब्जाए हुए क्षेत्र द्वारा पहुंचता है. इसलिए यह स्वाभाविक है कि भारत के इस कदम से चीन को उतनी ही तकलीफ हो रही है जितनी पाकिस्तान को.

पाकिस्तान और तथाकथित आज़ाद कश्मीर का संबंध क्या है?

आज पाकिस्तान, भारत द्वारा अपने संविधानसम्मत कदमों द्वारा जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A हटाने और राज्य के पुनर्गठन का विरोध कर रहा है, जो भारत के संविधान द्वारा उसके एक अभिन्न अंग के रूप में माना गया है. वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान एक अवैध रूप से अधिकृत क्षेत्र, जिसे वह स्वतंत्र भी बोलता है, के क्षेत्र में कैसे और किस अधिकार से, राज्य के क्षेत्राधिकारों के त्याग और प्रशासनिक और क्षेत्रीय पुनर्गठन का पक्षकार और हितग्राही बन जाता है?उल्लेखनीय है कि 28 अप्रैल, 1949 को तथाकथित आज़ाद कश्मीर के तत्कालीन स्वयंभू राष्ट्रपति मुहम्मद इब्राहिम और ऑल-जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस (AJKMC) के अध्यक्ष ग़ुलाम अब्बास ने पाकिस्तान के प्रतिनिधि मंत्री एमए गुरमानी के समक्ष एक समझौते पर हस्ताक्षर कर गिलगित और बाल्टिस्तान पर अपने अधिकारों को, पाकिस्तान सरकार के सम्मुख समर्पण कर दिया. पाकिस्तान की सरकार ने इसे स्वीकार भी कर लिया. अब एक हथियाए हुए क्षेत्र का कथित राष्ट्रपति और एक राजनैतिक पार्टी के टूटे हुआ गुट का नेता इतने महत्वपूर्ण निर्णय कर पाने की अधिकारिता कहां से प्राप्त कर रहे थे?इसके कुछ ही महीनों बाद 27 जुलाई 1949 को भारत और पाकिस्तान के सैन्य प्रतिनिधियों के बीच युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे. युद्धविराम समझौते के बाद पाकिस्तान ने बड़ी ही चालाकी से इस क्षेत्र में पाकिस्तान आर्मी एक्ट लागू कर दिया. इसे पाकिस्तान की सेना के नियंत्रण ले लिया और साथ ही इस क्षेत्र के स्थानीय लड़ाकों को मुक्त कर दिया.

अब पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए गए कश्मीर क्षेत्र (पीओके) और पाकिस्तान के बीच संबंधों की प्रकृति को परिभाषित किए बिना विभिन्न प्रख्यापित अध्यादेशों और विनियमों के माध्यम से, कब्जाए गए हिस्से की वित्तीय निर्भरता और प्रशासनिक मामलों में पाकिस्तान का अनियंत्रित हस्तक्षेप चला आ रहा है. इन वर्षों में, इन क्षेत्रों में, जो तथाकथित आज़ाद कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में विभाजित कर दिए गए हैं, में नाममात्र का प्रतिनिध शासन दिया गया है. यह पूरी तरह से इस्लामाबाद में बैठी सरकारों की दया के अधीन है. स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सेना ही यहां के शासन में गहरी भूमिका निभाती है. पाकिस्तान की सेना की पहली स्ट्राइक कोर का मुख्यालय इसी क्षेत्र में मंगला डैम के निकट स्थित है. इस क्षेत्र को पाकिस्तान के कठोर नियंत्रण में रखने के साथ-साथ भारत में आतंकवादी गतिविधियों के प्रसार में इस कोर ने ‘महत्वपूर्ण’ भूमिका निभाई है.

पाकिस्तान द्वारा राजनैतिक क्षेत्र पर कठोर नियंत्रण
1974 से पहले पाकिस्तान आधारित राजनीतिक दलों को तथाकथित आज़ाद कश्मीर की चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं थी. इसे उस वर्ष जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान आधारित राजनैतिक दलों के लिए पूरी तरह से खोल दिया. परिणाम यह हुआ कि अब इस क्षेत्र में इन्हीं दलों का वर्चस्व है और स्थानीय दलों को किनारे कर दिया गया है.
इन दलों का इस क्षेत्र की इच्छाओं-आकांक्षाओं और समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है. ये दल यहां केवल पाकिस्तानी एजेंडे का प्रसार करने के लिए एक स्थानीय एजेंट भर हैं. इसके लगभग दो दशक बाद, अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए बेनजीर भुट्टो ने 1994 में नॉर्दर्न एरियाज जो 2009 के बाद से गिलगित बल्तिस्तान के नाम से जाना जाता है, में भी पाकिस्तान आधारित राजनैतिक दलों की घुसपैठ को सुगम कर दिया.

तथाकथित आज़ाद कश्मीर कितना आज़ाद ?
तथाकथित आज़ाद कश्मीर में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सरकार है, पर यह सारा तामझाम केवल दिखाने भर के लिए है. वास्तव में इनकी हालत अत्यंत दयनीय है. इन्हें कोई अधिकार नहीं हैं और इनका अस्तित्व इस्लामाबाद की इच्छा और सुविधा पर निर्भर करता है. इन क्षेत्रों की ‘आजादी’ का हाल ऐसा रहा है कि 1974 तक एक मंत्री जो कश्मीर एंड नॉर्दर्न एरियाज (KANA) का प्रभारी होता था, वहां के सारे शासन का कर्ताधर्ता होता था. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस व्यवस्था को और भी कठोर बनाया. 1974 से पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री के नेतृत्व वाली एग्जीक्यूटिव काउंसिल इस क्षेत्र पर वास्तविक रूप से शासन करने लगी.इन सालों में इस क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने का ढोंग पाकिस्तान की सरकारें करती आई हैं, वह छुपा नहीं हैं. क्षेत्र को सख्त नियंत्रण में रखने के लिए इस्लामाबाद द्वारा राज्य की मशीनरी का भयानक रूप से इस्तेमाल किया गया है. उल्लेखनीय है कि 1974 तक नॉर्दर्न एरियाज के क्षेत्र में फ्रंटियर क्राइम रेगुलेशन लागू रहा, जो आज भी पाकिस्तान के पूर्ववर्ती फाटा (अब खैबर पख्तुनख्वा में सम्मिलित) क्षेत्र में लागू है और जिन्हें दुनिया के सबसे आदिम और क्रूर कानूनों में से माना जाता है.

पाकिस्तान का संविधान और पाक अधिक्रांत कश्मीर
आज पाकिस्तान भारत को उसके संविधान के अनुपालन का पाठ पढ़ा रहा है. दरअसल उसने कब्जाए गए क्षेत्र के साथ खुद के संविधान में उल्लिखित प्रावधानों के विपरीत व्यवहार किया है. पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 257 पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर क्षेत्र के शासन को संचालित करने के लिए पाकिस्तान को अधिकृत ही नहीं करता. इस अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘जब जम्मू और कश्मीर राज्य के लोग पाकिस्तान में विलय का निर्णय करेंगे, तब पाकिस्तान और उस राज्य के बीच का संबंध उस राज्य के लोगों की इच्छा के अनुसार निर्धारित किया जाएगा.’ अब इमरान खान और पाकिस्तान की सरकार और विपक्ष जिसे खुद के संविधान की जानकारी भले ही न हो पर भारत को संविधान का पाठ जरूर पढ़ाएंगे, जो उनकी पुरानी आदत है.

पाकिस्तान बार-बार संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के समय-समय पर जारी प्रस्तावों का उल्लंघन कर रहा है. परन्तु क्या पाकिस्तान स्वयं इसका अनुपालन कर रहा है? आज की स्थिति में तथाकथित आज़ाद कश्मीर न तो एक संप्रभु राज्य है और न ही पाकिस्तान का प्रांत, बल्कि युद्धविराम समझौते के तहत उसे सौंपे गए क्षेत्रों की जिम्मेदारी के साथ एक ‘स्थानीय प्राधिकरण’ भर रह गया है. वहींं दूसरी ओर गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति इस तथाकथित आज़ाद कश्मीर से भी बदतर है. इसकी पाकिस्तान के अधीन न कोई विधिक हैसियत है और वास्तविकता में इसे पाकिस्तान के एक उपनिवेश के रूप में शासित किया जा रहा है.इस पूरे क्षेत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे किसी भी मौलिक अधिकारों का पूर्ण रूप से अभाव है. सेना और आईएसआई की कठोर नीतियों के चलते यहां मार्शल लॉ जैसी स्थायी स्थितियां बनी हुई हैं, जिसका परिणाम अब यह है कि यहां की जनता के विभिन्न वर्गों में स्वायत्तता से लेकर पाकिस्तान से पूर्ण अलगाववाद की आकांक्षाएं चरम पर हैं.