पहाड़ पर भीड़

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- गरमी की छुट्टियों में घूमने-फिरने को लेकर पहाड़ लोगों की पहली पसंद होते हैं। जिन पहाड़ों तक चौड़ी सड़कें बन गई हैं, वहां ज्यादातर लोग अपने वाहन से परिवार समेत जाना अधिक पसंद करने लगे हैं। हमारे यहां कुछ ही पहाड़ी इलाके ऐसे हैं, जहां अधिकतर लोग जाते हैं। उनमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल प्रमुख हैं। ये स्थान चूंकि दिल्ली और उससे सटे शहरों, चंडीगढ़ आदि से नजदीक हैं, इसलिए यहां से अधिकतर लोग अपने वाहनों में जाते हैं। इन दिनों कश्मीर अशांत है, इसलिए वहां जाने वाले सैलानी भी इन्हीं क्षेत्रों का रुख करने लगे हैं। इसी का नतीजा है कि इन दिनों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थलों पर वाहनों का भारी जमावड़ा हो गया है। लोग दो-दो दिन से भीड़ में फंसे हुए हैं। उत्तराखंड में चूंकि चार धाम यात्रा भी शुरू हो चुकी है, इसलिए छुट्टियों में सैर-सपाटे के लिए निकलने वालों के अलावा बदरी, केदार जाने वाले श्रद्धालुओं का भी खासा भारी जत्था उधर का रुख किए हुए है। उत्तराखंड सरकार का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस साल करीब ढाई गुना श्रद्धालु वहां पहुंचे हैं, जिसका उसे अनुमान नहीं था। इसी तरह हिमाचल प्रदेश की मनाली घाटी में करीब एक लाख सैलानी और बीस हजार वाहन रोज प्रवेश कर रहे हैं।

पहाड़ी जगहों पर भीड़भाड़ के चलते वाहनों की गति थम जाने की कुछ वजहें साफ हैं। एक तो पहाड़ी रास्ते उस तरह चौड़े नहीं होते, जैसे मैदानी भागों में होते हैं। दो कतार बना कर लोगों को चलना पड़ता है, जिसमें एक जाने वालों की होती है और दूसरी आने वालों की। मगर मैदानी भागों और बड़े शहरों से जाने वाले सैलानियों को इस बात का इल्म नहीं होता। वे जहां भी खाली जगह देखते हैं, आगे निकलने की जल्दी में गाड़ी बढ़ा देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वहां गाड़ियां फंस जाती हैं। इसके अलावा पहाड़ों पर बड़े पैमाने पर गाड़ियां खड़ी करने की जगहें नहीं होती हैं। इसलिए लोग वाहन खड़ा करने के लिए जगहें न मिल पाने के कारण सड़कों के किनारे ठहरे रहते हैं और दूसरे वाहनों के आगे बढ़ने का रास्ता अवरुद्ध कर देते हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में सड़कों पर दूर-दूर तक वाहनों की भीड़ जमा होने का यही बड़ा कारण है। इस समस्या से पार पाने में वहां के प्रशासन का दम फूल रहा है। उसने ऊपर जाने वाले वाहनों को काफी दूर पहले मैदानी हिस्सों में ही रोकना शुरू कर दिया है। पर इससे पर्यटकों की परेशानियां कम नहीं हो पा रहीं।

हिमाचल और उत्तराखंड में सड़क मार्ग ही पहुंचने का मुख्य जरिया है। शिमला को छोड़ दें, तो वहां न तो रेल मार्ग है और न कारगर हवाई मार्ग, इसलिए भी लोग अपने वाहन का उपयोग करना बेहतर समझते हैं। प्रशासन इन कठिनाइयों से अनजान नहीं है। अगर वह पहले ही सतर्क रहता और आने वाले सैलानियों की संख्या का अधिकतम अनुमान लगा लेता, उस हिसाब से एहतियाती उपायों पर मुस्तैदी बरतता, तो यह समस्या न आने पाती। अगर बाहर से आने वाले वाहनों के लिए कुछ-कुछ दूरी पर ठहराव बनाए जाते और वहां से स्थानीय परिवहन की समुचित व्यवस्था कर दी जाती, तो परिवहन व्यवस्था को सुगम बनाया जा सकता था। मगर प्रशासन की फितरत है कि वह तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है, जब तक कि समस्या गंभीर नहीं हो जाती।