जानिए! चारों युगों में पाप और पुण्य की मात्रा के अलावा और किन-किन चीजों में हुआ परिवर्तन

 जनता से रिश्ता वेबडेस्क : हमारे पौराणिक ग्रंथों में चार युगों का वर्णन किया गया है। जिनमें सबसे पहले सतयुग, फिर त्रेतायुग, इसके पश्चात द्वापरयुग आया और वर्तमान में कलयुग चल रहा है। ग्रंथों के अनुसार जैसे – जैसे युगों में परिवर्तन हुआ व्यक्ति की जीवनचर्या के साथ ही उसकी आयु, लंबाई और अन्य गतिविधियों में भी अंतर आया। हम आपको यहां सभी युगों की प्रमुख बातों के बारे में जानकारी दे रहे हैं आइए जानते हैं इसके बारे में ……….

सतयुग :- सतयुग के बारे में ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि उस समय पाप की मात्रा शून्य थी यानि कोई भी व्यक्ति उस समय पाप नहीं करता था, इसी वजह से पुण्य 100 प्रतिशत होता था। वहीं सतयुग का तीर्थ पुष्कर को माना जाता है। इस युग में रत्नमय मुद्रा चलन में थी और पात्र यानि बर्तन सोने के होते थे।

त्रेतायुग :- सतयुग के समाप्त होने के बाद त्रेतायुग प्रारंभ हुआ, इस युग में पुण्य की मात्रा घटकर 75 प्रतिशत हो गई और पाप की मात्रा 25 प्रतिशत हो गई। इस युग का तीर्थ नैमिषारण्य माना जाता है और इस समय स्वर्ण मुद्राएं चलती थीं और चांदी के पात्र चलन में थे।

द्वापरयुग :- तीसरा युग द्वापरयुग था और इस युग में पाप और पुण्य की मात्रा समान हो गई। इस युग का तीर्थ कुरूक्षेत्र को माना जाता है और इस समय चांदी की मुद्रा चलन में थी और तांबे के बर्तनों का प्रयोग किया जाता था।

कलियुग :- चार युगों में से अंतिम युग है ​​कलियुग, वर्तमान में कलियुग चल रहा है और इस समय पाप की मात्रा बढ़कर 75 प्रतिशत हो गई ​है, वहीं पुण्य का अस्तित्व घटकर मात्र 25 प्रतिशत रह गया है। इस युग का प्रमुख तीर्थ गंगा को माना जाता है और वर्तमान में लो​हे की मुद्रा का प्रयोग किया जाता है, वहीं इस समय मिट्टी के पात्र चलन में हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here