जाति का दंश

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- गुजरात में अमदाबाद के वरमोर गांव में अंतरजातीय विवाह के बाद एक दलित युवक की हत्या की जो घटना सामने आई है, उससे एक बार फिर यही साबित होता है कि विकास के दावे चाहे जितने किए जाएं, लेकिन ऐसे मौकों पर यही लगता है कि एक समाज के रूप में हम बेहद पिछड़े हैं। गौरतलब है कि एक उच्च कही जाने वाली जाति की युवती और दलित समुदाय के एक युवक ने प्रेम विवाह किया था। लेकिन लड़की के परिवार वाले इसलिए बेहद नाराज थे कि एक निम्न कही जाने वाली जाति के लड़के ने उनकी बेटी से विवाह कर लिया। वे बहाने से लड़की को अपने घर ले आए। उसके कुछ समय बाद लड़के ने गुजरात में ऐसे मामलों को देखने के लिए गठित ‘अभयम’ समूह की सहायता ली और पत्नी को लाने उसके घर गया। लेकिन वहां लड़की के परिवार वालों ने उस पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया और ‘अभयम’ की पूरी टीम के सामने ही मार डाला। यह घटना बताती है कि जाति से जुड़ी श्रेष्ठता की ग्रंथि व्यक्ति की संवेदनाओं को किस कदर खत्म कर दे सकती है और बिना नतीजे की परवाह के जघन्य अपराध तक करवा डालती है।

सवाल है कि जब युवक ने ‘अभयम’ की मदद ली तो उस टीम ने अपने साथ पर्याप्त संख्या में पुलिस-बल को ले जाना क्यों जरूरी नहीं समझा? जबकि पिछले कुछ समय से गुजरात में दलितों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यह जगजाहिर है कि जाति-व्यवस्था ने समाज में कैसे विद्रूप रचे हैं और इंसानी संवेदनाओं का गला घोंटा है। एक उम्मीद यह की जाती है कि शिक्षा हासिल करने और सभ्य होने की कसौटियों पर गौर करने के बाद कोई समाज इस तरह की जड़ताओं से ऊपर उठ सकता है। मगर जाति की ग्रंथियों से संचालित व्यवहार कई बार इन तकाजों से बेअसर दिखते हैं। गुजरात की घटना में लड़की ने सामाजिक जड़ताओं या जाति को दरकिनार कर प्रेम और संबंध को तरजीह दी और इस तरह जातिगत दायरों को तोड़ कर एक इंसानी समाज की ओर कदम बढ़ाया। मगर उसके परिवार वालों के लिए यह मामूली बात स्वीकार करना क्यों संभव नहीं हुआ कि उनकी बेटी बालिग है और उसने अपना भला-बुरा समझ कर ही अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लिया होगा?

इससे अफसोसनाक और क्या हो सकता है कि विकास की चकाचौंध के बीच आज भी जाति के नाम पर झूठी इज्जत को बचाने के लिए प्रेमी जोड़ों को मार डाला जाता है। हाल में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जबकि न केवल सामाजिक संबंधों के लिहाज से, बल्कि संवैधानिक रूप से भी दो वयस्क लोगों को अपनी पसंद और चुनाव के मुताबिक किसी से प्रेम और विवाह करने का अधिकार है। इसमें जाति सहित कोई भी परंपरा बाधा नहीं बन सकती। लेकिन परंपरा में बंध कर जीते लोगों की मानसिकता इस कदर जड़ हो जाती है कि वे ऐसे संबंधों को संवेदना और कानून की कसौटी पर रख कर देख ही नहीं पाते। जातियों के दायरे में जीते हमारे समाज में यह सोचना तक जरूरी नहीं समझा जाता कि यह व्यवस्था कैसे मानवीयता के हर तकाजे को तार-तार करती है। उल्टे जाति के पायदान में ऊपर होने की वजह से उपजे श्रेष्ठताबोध के असर में डूबे लोगों को न इंसानी संवेदनाओं का खयाल रह पाता है, न उनके भीतर कानून का कोई भय होता है। यह समझना मुश्किल है कि तमाम पढ़ाई-लिखाई और आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद हमारा समाज जातिगत श्रेष्ठता की कुंठा के मनोविज्ञान में जीना क्यों ज्यादा सहज मानता है, जो कई बार