चैंपियन का संन्यास

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- युवराज सिंह ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास भले ले लिया हो, वे आइपीएल भी न खेलें, लेकिन क्रिकेट की दुनिया में उनकी मौजूदगी हमेशा बनी रहेगी। युवराज क्रिकेट के सवश्रेष्ठ भारतीय ऑलराउंडरों में शुमार रहे। उम्मीद है कि वे अब विदेशी लीग में जलवा बिखेरेंगे। सत्रह साल के अपने क्रिकेट-जीवन में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल कीं, वे अपने में रेकार्ड हैं। चाहे मैचों की संख्या हो, रनों का आंकड़ा हो या विकेट या फिर आइपीएल मैच के खिलाड़ी की कीमत हो, युवराज हमेशा एक चैंपियन के रूप में ही रहे, मैदान में भी और मैदान के बाहर भी। उन्नीस साल की उम्र में क्रिकेट की दुनिया में कदम रखने वाले युवराज की उपलब्धि का सिलसिला 2004 से ही शुरू हो गया था जब उन्होंने लाहौर में पाकिस्तान के खिलाफ पहली टेस्ट सेंचुरी लगाई थी। इसके बाद 2007 में उन्होंने टी-20 विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ एक ओवर में छह छक्के जड़े थे। इसीलिए उन्हें सिक्सर किंग भी कहा जाता है। इसके अलावा बारह गेंदों में सबसे तेज अर्धशतक भी लगाया था। विश्व कप में तीन सौ से ज्यादा रन और पंद्रह विकेट लेने वाले वे पहले आॅलराउंडर बने और 2011 में विश्व कप में ‘मैन आॅफ द सीरीज’ भी उन्हें मिला था।

बाजार में कीमत के हिसाब से देखें तो 2015 की आइपीएल नीलामी में वे सबसे महंगे खिलाड़ी के रूप में सामने आए थे। युवराज का जीवन दूसरे किक्रेट खिलाड़ियों से हट कर रहा है। उनके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 2011 में उस वक्त आया था, जब पता चला कि उन्हें फेफड़े का कैंसर हो गया है। यह कठिन वक्त था जब वे अपने करिअर के शीर्ष पर थे। लड़ना, गिरना और फिर उठ जाना युवराज की हमेशा से खूबी रही है। वे इस बात को स्वीकार भी करते हैं कि किक्रेट मेरे लिए एक ऐसा खेल रहा है जिसने मुझे लड़ना, गिरना और फिर उठ जाना सिखाया। उनके भीतर के इसी जुझारूपन और जज्बे ने कैंसर जैसी बीमारी से मुक्ति दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। युवराज ने कहा भी था कि कैंसर से ठीक होने के बाद वे एक तरह के भारी दबाव में थे, हर किसी को लग रहा था कि अब ये पहले वाला युवराज नहीं रहेगा। लेकिन युवराज ने इस दबाव को बड़ी चुनौती मानते हुए एक बार फिर साबित किया कि उनमें वही पुराना वाला दमखम आज भी है। इसके बाद ही युवराज ने 2012 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट खेला था। यह उनका आखिरी टेस्ट था। लेकिन वन डे, टी-20 और आइपीएल वे लगातार खेलते रहे।

युवराज की सत्रह साल की अंतरराष्ट्रीय किक्रेट की यात्रा वाकई शानदार रही। लेकिन पिछले कुछ समय से युवराज मैदान पर वैसा जलवा नहीं दिखा पा रहे थे जैसी उन्हें उम्मीद थी। इसीलिए बार-बार उनके मन में संन्यास को लेकर मंथन चल रहा था। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) के रुख से भी वे आहत रहे। उन पर यो-यो टेस्ट पास करने की शर्त लगा दी गई और इसमें पास न होने पर विदाई मैच तक की बात कह दी गई। हालांकि युवराज इस टेस्ट में पास हो गए थे और आखिरी टी-20 खेला। पिछले दो सालों में उनमें बेहतर प्रदर्शन का अभाव रहा, इसलिए इस बार की विश्व कप टीम में जगह बनने का सवाल ही नहीं था। हालांकि निश्चित ही युवराज के मन में इस बार का विश्व कप खेलने की इच्छा रही होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि युवराज का क्रिकेट-जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं होगा।

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