काशी पूर्वी भारत विकास का सार्थक मॉडल बनी

जनता से रिश्ता वेबडेस्क :-  प्रश्न यह नहीं कि काशी के विकास में कितनी ईंटें जुड़ी। अहम यह है कि मिली जवाबदेही को निभाने में किसी शख्स ने कितनी संवेदनशीलता और ईमानदारी दिखायी। पीएम या फिर बाकी बड़ा ओहदा। स्वाभाविक रुप से चिंता का व्यापक दायरा। लेकिन कोई सांसद अपने क्षेत्र की कितनी चिंता करता है, बड़ी बात है। एक दफा किसी बड़े नेता से सवाल हुआ कि आपने अपने क्षेत्र के लिए तो कुछ किया नहीं। उनका जवाब आया। पूरे देश का एक हिस्सा अपना क्षेत्र भी है। सो, जब देश का विकास होगा तो इस क्षेत्र का भी। लेकिन काशी के सांसद यानी नरेन्द्र मोदी जी यहीं औरों से अलग दिखते हैं। प्रधानमंत्री हैं और काशी के सांसद भी। सांसद के नाते अपने क्षेत्र की चिंता कैसे की जाती है, कोई काशी आकर देखे। विकास हुआ, निरंतर हो रहा है। आगे भी होगा। बड़ी बात यह नहीं। बात यह कि एक सांसद अपने लोगों से रिश्ता बनाने में कितनी गहराई में डूबा। प्रधान हो, पार्षद हो, आम मतदाता हो, दलगत भावना से अलग अपने सांसद के प्रति मोहब्बत का इज़हार करता है, तो बात समझ में आती है। हाँ। वाक़ई प्रतिनिधि को ऐसा ही होना चाहिए।काशी सदियों से वेद , पुराणों और शास्त्र एवं ग्रंथों में है। इसलिए नहीं कि यहाँ पहले से कोई महल अटारी रही है। बड़ी हवेलियां और मॉल, होटल्स रहे है। भारतेंदु बाबू के शब्दों में काशी मुट्ठी भर चना चबेना और एक अंजुल गंगाजल की औकात वाली नगरी है। यही उसकी संस्कृति है जो सदियों से जीवित रही है। मोदी जी ने और क्या किया, नहीं किया लेकिन इस भाव को पूरी दुनिया में जागृत कर दिया। गांव , शहर की वही पुरानी गलियां दमकती हैं तो जगह जगह पान की पीक छोड़ने वाले अब ख़ुद को संभालते हैं। दूसरों का फेंका पत्ता हाथ आगे बढ़ा थाम लेते हैं।विकास की बात करेंगे तो सचमुच काशी पूर्वी भारत का गेटवे बन स्वागत को तैयार है। साल बीतते-बीतते बिहार, बंगाल, एमपी, छत्तीसगढ़, झारखंड और प्रयाग नगरी, राज्य की राजधानी लखनऊ तक की सड़कें अपनी बदली सूरत की कहानी बयां करेंगी। पुराने शहर में बाबा आदम जैसी व्यवस्था को ढो रहे बिजली के उलझे तार घरों तक सूरज के प्रकाश रोक खड़े होते थे, अब जर्जर तारों का संजाल भूमिगत हो गया है। गरीब की रसोईं से धुआं हट रहा है तो किसान अब देश की किसी मंडी तक मिर्ची , टमाटर बेच सकेगा। गाँव में महिलाओं की टोली चरख़ा कात अपनी ख़ुद की पूँजी बना रही हैं तो युवा पारंपरिक उत्पादों के जरिए कमाई कर रहे हैं। गांवों को मॉडल रुप में देखने को जयापुर, नागेपुर काफ़ी है। महिला टोली पल्लू से गंठियाया रुप्पैया अब अपने गाँव में बने बैंक में बचत खाते में डालती हैं। गंगातट पर सैलानियों की भीड़ और रात एलईडी की चकाचौंध बढ़ाती हैं तो उनके मुँह से बरबसही निकलता है। ग्रेट काशी। रेलवे स्टेशन को चार साल पहले देखने वाले कह उठते हैं, अरे!! ऐसा!!!। तो क्या कुछ नहीं बदला है। तो आइए.. बाबा विश्वनाथ की नगरी में जिसे मोदी जी कहते हैं ‘मेरी काशी’, रुकिए, निहारिए, तब जाइए। फर्क समझ में आएगा साब। सफ़र में अब धूप नहीं छांव मिलेगा साबजी, साथ चल सको तो चलो।