कांग्रेस मंत्रिमंडल में दिखेगा अनुभव जातीय समीकरण की झलक…

सभी वर्ग को प्रतिनिधित्व देने निगम-मंडल में समायोजित होंगे दिग्गज

जसेरि रिपोर्टर/जनता से रिश्ता वेबडेस्क
रायपुर। 15 साल के बाद जिस तरह कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है उसमें मंत्रिमंडल कैसा होगा इस पर माथापच्ची शुरू हो गई है। दिग्गजों की शानदार जीत के साथ सत्ता में कांग्रेस ने वापसी की है। इस जीत को कांग्रेस हाईकमान सहित प्रादेशिक नेताओं ने सभी वर्ग को संतुष्ट करने की रणनीति बनाई है। जातिय समीकरण के साथ अनुभवी नेताओं को मंत्रिमंडल में स्थान मिलना तय माना जा रहा है। मंत्रिमंडल में दो उपमुख्यमंत्री के साथ चुनाव घोषणआ पत्र समिति के चेयरमैन टीएस सिंहदेव, साहू समाज के नेता ताम्रध्वज साहू, ब्राम्हण कोटे से रविंद्र चौबे, सत्यनारायण शर्मा, अमितेष शुक्ला, हाईप्रोफाइल सीट से पूर्व आईएएस अधिकारी ओम प्रकाश चौधरी को हराने वाले और जीरम घाटी के शहीद नेता नंदकुमार पटेल के पुत्र उमेश पटेल, मोतीलाल वोरा के कोटे से अरूण वोरा, राजधानी में रायपुर उत्तर से जीत दर्ज करने वाले कुलदीप जुनेजा, धनेद्र साहू, सतनामी समाज को प्रतिनिधित्व देने प्रदेश प्रभारी के करीबी रहे डा. शिवकुमार डहरिया,बस्तर के दबंग नेता कवासी लखमा, राहुल गांधी के कोटे से चरणदास महंत को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की संभावना है। अविभाजित मध्यप्रदेश में हुए चुनाव 1998 के बाद यह पहला मौका होगा, जब छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के सारे दिग्गज नेता जीत कर विधानसभा पहुंचेंगे। 98 में सत्यनारायण शर्मा, रविंद्र चौबे, भूपेश बघेल, धनेंद्र साहू, मोहम्मद अकबर, अमितेष शुक्ल, ताम्रध्वज साहू, मनोज मंडावी और अरुण वोरा न केवल चुनाव जीते थे बल्कि पहले दिग्विजय सिंह सरकार और बाद में अजीत जोगी सरकार में मंत्री या मंत्री के समकक्ष रहे। अरुण वोरा को जोगी सरकार ने युवा आयोग का चेयरमैन बनाकर राज्य मंत्री का दर्जा दिया था। उनके अलावा बाकी सभी मंत्री रहे। लेकिन इस बार कई और नेता भी चुनाव जीतकर आए हैं, जिससे कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री को मंत्री बनाने में सहनशीलता बरतनी पड़ेगी।
20 साल बाद विधानसभा में पहुंचेंगे महंत
पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत 20 साल बाद सक्ती से चुनाव जीतकर पहली बार छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहुंचेंगे। उन्हें सीएम पद के दावेदार भी माना जा रहा हैं। जातिगत समीकरण में यहां तक नहीं पहुंच पाए तो उन्हें किसी बड़े विभाग का मंत्री बनाया जा सकता है। दिग्विजय सिंह सरकार में महंत की सीएम के बाद दूसरे नम्बर की हैसियत थी। कहते हैं, महंत के बढ़ते प्रभाव को देखते ही उस समय के सीएम दिग्विजय सिंह ने महंत को जांजगीर लोकसभा से चुनाव लड़ाकर रास्ते से हटा दिया था। महंत उस समय मध्यप्रदेश के गृह, परिवहन एवं जेल के साथ ही जनसंपर्क विभाग संभाल रहे थे।
12 मंत्री बनाने की बाध्यता
महंत के मंत्रिमंडल से हटने के बाद दिग्गी सरकार में सत्यनारायण शर्मा की हैसियत बढ़ाई गई। खनिज और वाणिज्यिक कर जैसे कई विभागों को संभालने वाले शर्मा तब छत्तीसगढ़ से सबसे प्रभावशाली मंत्री बने थे। तब मंत्रिमंडल की 15 फीसदी का बाध्यता नहीं थी। इसीलिए, अजीत जोगी ने भी दो दर्जन से अधिक मंत्री बना डाले थे। कई विभागों में कैबिनेट और राज्य मंत्री होते थे। गृह में नंदकुमार पटेल कैबिनेट मंत्री थे और उनके साथ मनोज मंडावी और तुलेश्वर सिंह राज्य मंत्री। अब सीएम के अलावा सिर्फ 12 मंत्री बनाने की बाध्यता है। कांग्रेस के बड़े चेहरे इस बार अधिक जीत कर आए हैं।
मुख्यमंत्री के चेहरे में चार दिग्गज
मुख्यमंत्री के लिए ही चार चेहरे खुलकर सामने हैं। भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, चरणदास महंत और ताम्रध्वज साहू। इनके अलावा रविंद्र चौबे और सत्यनारायण शर्मा भी कमजोर दावेदार नहीं होंगे।
मंत्री बनने के लायक जो चेहरे जीते
चौथी विधानसभा में मंत्री बनने के लायक जो चेहरे जीते हैं, उनमें शकुंतला साहू जो स्पीकर गौरीशंकर अग्रवाल को पटखनी देकर विधायक बनी हैं। हालांकि, उनका यह पहला चुनाव है, लेकिन, भाजपा का बड़ा विकेट चटकाने के एवज में उन्हें इनाम तो मिलेगा ही। दूसरी महिला धरसीवां से देवजी भाई पटेल को हराने ेवाली अनिता योगेंद्र शर्मा जिसे झीरण शहीद की पत्नी होने का फायदा मिल सकता है। शकुंतला को मंत्री बनाने के कांग्रेस पार्टी के दो फायदे हैं। एक तो महिला और दूसरा साहू। एक साथ वह दो वर्गों को साधा जा सकता है। ये सभी नाम मिलाकर 17 होते हैं। इनमें एक सीएम, एक स्पीकर और डिप्टी स्पीकर बनेंगे। बचे 14, मंत्री पद हैं सिर्फ 12 है। इसके अलावा आठ बड़े मंत्रियों को हराने वाले विकास उपाध्याय, देवेंद्र यादव और शैलेष पाण्डेय भी मंत्री पद की दावेदारी कर सकते है।
आदिवासी कार्ड के साथ ओबीसी को महत्व
आदिवासी वर्ग से अमरजीत भगत, मनोज मंडावी और एसएस सोरी मंत्री पद के दावेदार होंगे। ओबीसी से चरणदास महंत, ताम्रध्वज साहू, धनेंद्र साहू, उमेश पटेल और शकुंतला साहू हैं।
सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी
कांग्रेस संगठन में 15 साल से काम करने वालों की दावेदारी अब निगम-बोर्ड की ओर टिक गई है। जिसमें शैलेष नीतिन त्रिवेदी, रमेश वल्र्यानी और राजेंद्र तिवारी जैसे कई नाम हैं, जिन्हें बोर्ड-आयोगों में समायोजित करना ही पड़ेगा। कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री और कांग्रेस आलाकमान के लिए मंत्रिमंडल गठन के साथ जमीनी और सक्रिय नेताओं को सम्मानजनक स्थान देना सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। क्योंकि किसी को भी नाराज नहीं किया जाएगा । 15 साल बाद सत्ता में लौटने का सुख तो इनके हिस्से में बनता ही है। जितना योगदान बड़े नेताओं का है उतना ही इन नेताओं का जो आंदोलन के दौरान लाठी खाए और जेल गए। इनके त्याग और परिश्रम का लाभ इनके खाते में जाना तय माना जा रहा है।