उम्मीद का नल

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- आजादी के सात दशक बाद भी देश के बयासी फीसद गांव नल के लिए तरस रहे हैं। हालत यह है कि इन गांवों में पानी के लिए लोग आज भी पारंपरिक स्रोतों पर ही निर्भर हैं। ऐसा नहीं है कि गांवों में पानी पहुंचाने के लिए कभी योजनाएं नहीं बनीं। सरकारों में बैठे कर्णधार इस समस्या के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, चर्चाएं चलती रहीं, योजनाएं भी बनती रहीं, इस मद के लिए धन का आबंटन भी होता गया, लेकिन जो काम होना था वही नहीं हुआ- इन योजनाओं पर ईमानदारी से अमल। हकीकत यह है कि ऐसी योजनाएं फाइलों में ही चलती रहीं। लोगों को पानी मिलने लगे, यह किसी भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहा। जनप्रतिनिधि भी जानते हैं कि उनके निर्वाचन क्षेत्रों में जलापूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे गांवों की तादाद काफी बड़ी है जहां लोगों को पानी लेने के लिए मीलों दूर जाना पड़ता है, खासतौर से उन इलाकों में जहां जलस्रोतों का अभाव है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीण इलाकों में जलापूर्ति की हालत क्या होगी।

लेकिन अब उम्मीद की जानी चाहिए कि तस्वीर कुछ बदलेगी। केंद्र सरकार ने अगले पांच साल में हर गांव के हर घर में नल से जल पहुंचाने की परियोजना को पूरा करने की बात कही है। अगर इस पर अमल होता है और कामयाबी हासिल हो जाती है तो यह उपलब्धि गांवों के लिए बड़ा वरदान साबित हो सकती है। इसके लिए राज्यों को भी बराबर की दिलचस्पी और ईमानदारी दिखानी होगी। हालांकि हर गांव के हर घर में नल के जरिए पानी पहुंचाना आसान नहीं है। इसमें कई तरह की भौगोलिक, तकनीकी, आर्थिक व संसाधन संबंधी बाधाएं आएंगी। लेकिन सरकारें इस काम को पूरा करने के लिए ठान लें तो असंभव भी नहीं है। भारत के ही राज्य सिक्किम ने ऐसा कर भी दिखाया है। सिक्किम के निन्यानबे फीसद घरों में पानी की सप्लाई नलों के जरिए की जाती है। ऐसी कामयाबी हासिल कर लेने वाला सिक्किम देश का पहला और एकमात्र राज्य है। दूसरी ओर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार, जो मिल कर उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा बनाते हैं, इस मामले में आज तक कोई तरक्की नहीं कर पाए। गांवों की तो बात दूर, ज्यादातर शहरों में जलापूर्ति व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। ऐसे में हर गांव के हर घर में नल के जरिए पानी पहुंचाने का अभियान चुनौतीभरा होगा।

देश में उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जिनके मात्र पांच फीसद ग्रामीण इलाकों में ही नलों के जरिए पीने के पानी की आपूर्ति की जाती है। हालांकि पानी की गुणवत्ता के सवाल पर तो किसी का ध्यान ही नहीं है। दक्षिण के राज्यों में कमोबेश ऐसी ही हालत है। देश के अन्य पहाड़ी राज्यों और रेगिस्तानी भू-भाग में पड़ने वाले ज्यादातर गांव ऐसे हैं जहां जलस्रोत ही नहीं हैं। मोटा अनुमान बता रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ही हर गांव के हर घर में नल से पानी पहुंचाने की परियोजना पर करीब सवा लाख करोड़ रुपए का खर्च आएगा। अब तक का अनुभव यह बताता है कि ऐसी परियोजनाएं पूरी होने में खासा वक्त लगता है और इनकी लागत भी बढ़ती जाती है। दूसरी बड़ी बाधा यह है कि इस तरह के महाअभियान में भ्रष्टाचार भी काफी होता है जो काम भी पूरा नहीं होने देता और लागत भी बढ़ाता जाता है। भारत में बुनियादी समस्या यही है। वरना जो मिसाल सिक्किम ने पेश की, क्या दूसरे राज्य वैसा नहीं कर सकते!

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