इतिहास का पन्ना

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- यह पहली बार है, जब किसी गैर-कांग्रेसी सरकार ने केंद्र में दुबारा बहुमत हासिल किया है। तमाम आकलनों, अनुमानों को निर्मूल साबित करते हुए भाजपा ने दूसरी बार अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया है। हालांकि मतदान पश्चात सर्वेक्षणों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को तीन सौ से चार सौ के बीच सीटें आने के संकेत मिले थे, पर बहुत सारे लोग उन्हें सही नहीं मान रहे थे। इसका आधार सिर्फ यह था कि इस बात पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि भाजपा अपना पिछला मत प्रतिशत कायम रख पाएगी। क्योंकि पिछले आम चुनाव में उसे सत्ता-विरोधी लहर का फायदा मिला था। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार से लोगों में नाराजगी थी। इस बार वैसी कोई लहर नहीं थी, बल्कि सत्ता के पक्ष में भी कोई लहर नजर नहीं आ रही थी। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से सरकार के प्रति लोगों में व्यापक नाराजगी का अनुमान लगाया जा रहा था। फिर विपक्षी दलों ने इस बार कुछ अधिक ताकत के साथ अपने को चुनाव मैदान में उतारा था। क्षेत्रीय दलों से कड़ी चुनौती मानी जा रही थी। इसके अलावा उन राज्यों में भाजपा के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा था, जहां पिछली बार उसने सारी की सारी या फिर अधिकतम सीटों पर जीत हासिल की थी। खासकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में बड़े नुकसान के कयास थे। हालांकि यहां हुए नुकसान की कुछ भरपाई पश्चिम बंगाल और ओड़ीशा से होने की उम्मीद की जा रही थी। इन सबके बीच कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अच्छा-खासा फायदा मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था। मगर नतीजों ने इन तमाम आकलनों पर पानी फेर दिया।

भाजपा की यह जीत न सिर्फ इस मायने में ऐतिहासिक है कि उसने दुबारा सत्ता में वापसी की है, बल्कि पहले की अपेक्षा अधिक सीटें हासिल की हैं। जहां उसके नुकसान के अनुमान लगाए जा रहे थे, वहां भी उसने अपनी हैसियत बरकरार रखी है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में मिली शिकस्त के बावजूद उसने लोकसभा चुनाव में अपना दबदबा कायम रखा। यही नहीं, कुछ नए राज्यों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति बनाई है। पश्चिम बंगाल और ओड़ीशा के अलावा कर्नाटक में वह दमदार पार्टी के रूप में उभरी है। कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद माना जा रहा था कि लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को खासा नुकसान पहुंचेगा, पर ये अनुमान भी निर्मूल साबित हुए। उत्तर प्रदेश में उसके अधिक नुकसान का आकलन था, पर वहां भी उसे बहुत चोट नहीं पहुंची। जबकि वहां सपा और बसपा के गठजोड़ से जातीय समीकरण के चलते भारी उलटफेर का अनुमान था। महाराष्ट्र और गुजरात में भी उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल पाई। यानी पूरे देश के स्तर पर जनादेश उसके पक्ष में आया।

हालांकि विपक्षी दल लगातार सरकार के कामकाज के तरीके, अर्थव्यवस्था की कमजोर हालत, रोजगार और खेती-किसानी के मोर्चे पर निराशा आदि के विवरण देते रहे, कई क्षेत्रीय और जातीय समीकरण भी बनाए-बिठाए गए थे, पर वे भाजपा के खिलाफ काम नहीं आ सके तो उसकी कुछ वजहें साफ हैं। पहला तो यह कि विपक्ष पिछले पांच सालों में लगातार कमजोर दिखता रहा। इस तरह विपक्ष का कोई सशक्त चेहरा लोगों के सामने नहीं था। फिर चुनाव के वक्त गठबंधन करने में भी वे सफल नहीं हो पाए। चुनाव बाद सरकार बनाने के समीकरण बनाए जाने लगे। इन तमाम स्थितियों के बीच कांग्रेस के बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरने की उम्मीद जताई जा रही थी। मगर हकीकत यही है कि कांग्रेस के प्रति लोगों का विश्वास बहाल नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस अध्यक्ष हमेशा एक कमजोर और अनुभवहीन नेता ही नजर आते रहे। मौजूदा सरकार पर उस तरह के कोई भ्रष्टाचार के आरोप भी नहीं थे, जैसे यूपीए के समय कई कांग्रेसी नेताओं पर लगे थे। इसके अलावा कैडर के स्तर पर भाजपा की जैसी उपस्थिति पूरे देश में बूथ स्तर पर थी, वैसी कांग्रेस की नहीं थी। इन तमाम बातों के मद्देनजर लोगों में यह धारणा कायम रही कि नरेंद्र मोदी को एक मौका और दिया जाना चाहिए। अखिरकार यह चुनाव मुख्य रूप से भाजपा ने उनके चेहरे को सामने रख कर लड़ा था। लोगों में उनके प्रति विश्वास बना हुआ था, उनसे उम्मीदें कायम थीं, जिसकी परिणति इन नतीजों के रूप में हुई।