आतंक के खिलाफ

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:- यह जगजाहिर है कि आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चे के क्रम में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अक्सर सुरक्षा बलों के शिविरों पर आतंकी हमले और उसमें शहीद होने वाले जवानों के बारे में खबरें आती रहती हैं। दूसरी ओर, कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में आतंकी भी मारे जाते हैं। इसके बावजूद हर कुछ दिनों पर आतंकी हमले एक नई चिंता पैदा कर जाते हैं। ऐसे हमलों के पीछे आतंकवादी गिरोहों के वे सरगना होते हैं जो आमतौर पर पर्दे के पीछे रह कर इन गतिविधियों को संचालित करते हैं। इसमें पाकिस्तानी ठिकानों से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले गिरोहों की भूमिका छिपी नहीं है। जाहिर है, जब तक आतंक के स्रोतों पर चोट न हो, तब तक उन्हें कमजोर करना मुश्किल होगा। इस लिहाज से देखें तो गुरुवार को दक्षिण कश्मीर के त्राल कस्बे में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में कुख्यात आतंकी जाकिर मूसा के मारे जाने को बड़ी कामयाबी के रूप में देखा जा सकता है। माना जाता है कि जाकिर मूसा अलकायदा की कश्मीर इकाई अंसार गजवत-उल-हिंद का प्रमुख था और पिछले करीब तीन साल से सुरक्षा बलों ने उसे निशाने पर रखा हुआ था। उस पर पंद्रह लाख रुपए का इनाम घोषित था।

गौरतलब है कि जाकिर मूसा को उसी इलाके में मार गिराया गया, जहां 2016 में बुरहान वानी को ढेर किया गया था। बुरहान वानी को हिज्बुल के एक अहम कमांडर के रूप में जाना जाता था और मूसा लंबे समय तक उसका सहयोगी रहा था। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में एक बड़ा प्रतिरोध खड़ा हो गया था। उसी तरह जाकिर मूसा की मौत के बाद शोपियां, पुलवामा, अवंतीपुरा और श्रीनगर में विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी शुरू हो गई। अराजकता की आशंका के मद्देनजर घाटी के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लगाना पड़ा और मोबाइल-इंटरनेट सेवा निलंबित करने के साथ-साथ सभी स्कूल-कॉलेजों को बंद करने के आदेश दिए गए। मूसा ने स्थानीय लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई हुई थी। वह त्राल के नूरपोरा का रहने वाला था। उसके पिता एक सरकारी महकमे में इंजीनियर हैं और मूसा भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ कर आतंकवाद की राह पर चल पड़ा था।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में यह एक पहलू है कि सुरक्षा बल आतंकियों से निपटने के लिए हर स्तर पर चौकसी बरतते हैं, उनके हिंसक हमले का सामना करते हैं या फिर मुठभेड़ में मार गिराते हैं। इसे सुरक्षा बलों की कामयाबी के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन घाटी में सक्रिय आतंकियों को पाकिस्तान स्थित ठिकानों से काम करने वाले आतंकवादी संगठनों से मिलने वाली शह समस्या को जटिल बना देती है। हालांकि यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर युवा आतंकवाद का रास्ता चुन लेते हैं तो उसके क्या कारण हैं। यों कई मौकों पर आतंकियों के परिवार आतंक के रास्ते पर चल पड़े अपने बच्चों से मुख्यधारा में लौट आने की अपील करते हैं। इसमें सुरक्षा बलों ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई है। कई बार ऐसी अपीलों का सकारात्मक असर भी सामने आया है। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के बीच आतंकवाद के गहरे असर के मसले पर भी संवाद स्थापित करने की कोशिश होती है। आतंकवादी गिरोहों के खिलाफ सख्ती के साथ-साथ समांतर स्तर पर ऐसे बहुस्तरीय प्रयासों से दीर्घकालिक नतीजे सामने आ सकते हैं।

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