अपराध की रेल

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:-  रेल अक्सर बॉक्स आफिस पर फिल्मों का टकराव देखने को मिलती हैं। ऐसा हर बार होता है, लेकिन अब मेकर्स इस क्लैश को टालने की कोशिश करते हैं लेकिन कभी कभी ये असंभव हो जाता हैं। खासकर ये क्लैश तब देखने को मिलता है जब कोई राष्ट्रीय अवकाश या फिर त्योहार के आस पास इस तरह के क्लैश आधिक होते है। ऐसा इसलिए होता है जिससे दर्शकों को ज्यादा से ज्यादा ध्यान फिल्म की तरह आकर्षित हो सके। तो हम आपको बता दें कि इस साल को सबसे पहला बड़ा क्लैश इस महीने यानी जनवरी में हो रहा है। 11 जनवरी को द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और उरी फिल्म एक साथ रिलीज हो रही है। दोनों ही फिल्मों की कहानी सियासत से जुड़ी हुई है।गाड़ियों में लूटपाट की घटनाओं और उनसे यात्रियों को निजात दिलाने का मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है। पर इस ओर अब तक कोई ठोस पहलकदमी नहीं हुई है, जिससे लगे कि किसी व्यक्ति को ट्रेन से कहीं आने-जाने में सुरक्षा संबंधी कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं है। नतीजा यह है कि अक्सर इस तरह की घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनमें अपने गंतव्य के लिए निकले व्यक्ति का सारा सामान ट्रेन में या तो चोरी हो जाता है या फिर कई बार वह लूटपाट या डकैती का शिकार हो जाता है। बुधवार देर रात दिल्ली से बिहार के भागलपुर जाने वाली एक ट्रेन में जिस तरह की डकैती सामने आई, वह यात्रियों को सुरक्षित सफर का भरोसा दिलाने वाले रेलवे को आईना दिखाती है। बिहार के किऊल और जमालपुर स्टेशन के बीच एक सुनसान जगह पर हथियारबंद लुटेरों ने ट्रेन को चेन खींच कर रुकवाया और फिर दो शयनयान सहित एक वातानुकूलित डिब्बे में सभी यात्रियों का सामान लूट लिया। उन्होंने महिलाओं से जबरन गहने उतरवा लिए, दर्जनों मोबाइल और नकदी सहित करीब तीस लाख रुपए लूट लिए। कई यात्रियों के साथ बुरी तरह मारपीट भी की।

हैरानी की बात है कि यह लूटपाट एक घंटे से ज्यादा चली, लेकिन इस बीच यात्रियों को कहीं से सुरक्षा या मदद नहीं मिल सकी। ट्रेन में लूटपाट की ताजा घटना अपने आप में बताने के लिए काफी है कि सुरक्षित सफर के रेल महकमे के दावों की हकीकत क्या है। खबरों के मुताबिक ट्रेन में न तो पुलिसकर्मी थे, न टीटीई। खुद रेल पुलिस के अधिकारी ने बताया कि ट्रेन में कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। सवाल है कि फिर क्या यह घटना किसी सुनियोजित साजिश और मिलीभगत का नतीजा थी? अगर नहीं तो क्या रेल महकमा ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को लुटेरों और अपराधियों के रहमोकरम पर छोड़ देता है? ऐसी घटना के बाद संबंधित महकमे इस तरह के आश्वासन देने की औपचारिकता निभाना नहीं भूलते कि रेलवे हर वह उपाय करेगा, जिससे यात्रियों का सफर सुरक्षित और सहज हो। यह आए दिन ट्रेन दुर्घटनाओं के समांतर दूसरी गंभीर समस्या है, जिसके चलते ट्रेनों का सफर जोखिम भरा बना हुआ है। एक ओर यह दावा किया जाता है कि देश की रेलवे सेवा को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जाएगा। बुलेट ट्रेन जैसी महत्त्वाकांक्षी और बेहद महंगी परियोजनाएं जमीन पर उतारने की कोशिश चल रही है, जिनका आम लोगों से कोई वास्ता नहीं है। दूसरी ओर, रेल किरायों में बेलगाम बढ़ोतरी से लेकर सुरक्षा के नाम पर इस मद में यात्रियों से टिकट में पैसे वसूलने की हकीकत यह है कि ट्रेनों में पुलिस या सुरक्षाकर्मी तक नहीं होते। हालत यह है कि कर्मचारियों से लेकर संचार की जरूरी व्यवस्था के अभाव की वजह से तत्काल मदद पहुंचना तो दूर, इस तरह की डकैती या लूटपाट की घटना के समय सुरक्षा के लिए पुलिस से संपर्क तक नहीं हो पाता। ज्यादातर ट्रेनों का समय पर न चलना या लेटलतीफी इस दशा में पहुंच गई है कि इसके भरोसे कहीं भी समय पर पहुंचना एक सपना रह गया है। कोहरे जैसी बिना किसी उचित वजह के कई बार ट्रेन को रद्द तक करना पड़ रहा है। बेहद मजबूरी में लोगों को बस या हवाई जहाज जैसे विकल्प चुनने पड़ रहे हैं। सवाल है कि क्या ट्रेन का सफर सरकार की नजर में इस कदर उपेक्षा के लायक रह गया है!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here