सम्पादकीय

फिर रेल हादसा

Kunti
14 Jan 2022 6:37 PM GMT
फिर रेल हादसा
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पश्चिम बंगाल में हुई रेल दुर्घटना जितनी चिंताजनक, उतनी ही दुखद भी है।

पश्चिम बंगाल में हुई रेल दुर्घटना जितनी चिंताजनक, उतनी ही दुखद भी है। लगभग 34 महीने बाद रेल दुर्घटना हुई है, जिसमें पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के दोमोहानी इलाके में गुरुवार शाम गुवाहाटी-बीकानेर एक्सप्रेस के 12 डिब्बे पटरी से उतर गए थे। इस हादसे में नौ लोगों की मौत हो गई और अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। बचाव कार्य तेजी से चल रहा है और मुआवजे की भी घोषणा कर दी गई है। जांच भी शुरू हो गई है, लेकिन ऐसा लगता है कि जब रेलों का संचालन बढ़ रहा है, तो लापरवाही भी बढ़ी है। यह दुर्घटना बड़ी हो सकती थी, ट्रेन में 1,200 से ज्यादा यात्री सवार थे। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी घटनास्थल पर पहुंच गए। सीमा सुरक्षा बल, स्थानीय पुलिस, रेलवे और एनडीआरएफ की टीम राहत और बचाव कार्य में जुट गई, तो लोगों तक जल्दी राहत पहुंचाने में सफलता मिली है। दुर्घटना की जगह ज्यादा मुश्किल या दूरदराज में नहीं थी, इसलिए भी वहां तक राहत पहुंचाने का काम आसान रहा है। ध्यान रहे, ज्यादातर रेल हादसे देर रात या सुबह मानवीय खामी की वजह से होते हैं, जिनमें जान-माल का नुकसान ज्यादा होता है।

यह हादसा इसलिए भी लोगों के बीच ज्यादा चर्चा का विषय है, क्योंकि यह महीनों बाद हुआ है। लॉकडाउन के लंबे समय में ट्रेनों का परिचालन लगभग बंद था और अभी भी टे्रनें पूरी तरह से नहीं चल रही हैं। ऐसे में, इस हादसे ने अनेक सवाल पैदा किए हैं, जिन पर रेलवे को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। क्या रेलों का परिचालन कम होने से पटरियों पर कोई असर पड़ा है? क्या पटरियों के रखरखाव में कमी आई है? क्या नई पटरियां बिछाने का काम आवश्यक गति से नहीं चल रहा है? आम तौर पर ट्रेन हादसों के कारणों पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा नहीं होती। जांच बैठती है, और लोग हादसे को भूल जाते हैं। लेकिन यह काम रेलवे और सरकार का है कि ऐसे हादसों की ईमानदार जांच हो और सुधार के पर्याप्त कदम उठाए जाएं। सेना के बाद रेलवे को ही भारत में सबसे अनुशासित महकमा माना जाता है, लेकिन क्या इस सेवा में कोताही करने वालों को यथोचित सबक सिखाया जाता है? हादसों के बाद की जांच की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू किया जाता है? उन लोगों से पूछिए रेलवे से जुड़े अनुभव, जो जान-माल का नुकसान झेल चुके हैं।
विशालकाय भारतीय रेलवे को दुरुस्त रखने के लिए आम तौर पर सालाना 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की जरूरत है, लेकिन आवंटन कितना है? तीन साल पहले के उपलब्ध आंकड़ों को अगर देखें, तो इस अहम मद के लिए एक चौथाई जरूरी धन भी नहीं रखा जाता है। इधर, रेलवे को कोरोना और लॉकडाउन से 36,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। इससे भी रेलवे की सेहत पर असर पड़ा है। रेलवे ने पहले की तरह किराये में रियायत देना कम कर दिया है, लेकिन उसे सेवा में कोताही नहीं करनी चाहिए। बच्चों को दी जाने वाली रियायत को खत्म हुए पांच साल से ज्यादा बीत गए, अब वरिष्ठ जनों को मिलने वाली रियायत भी निशाने पर है। सुविधाओं में भी कमी आ रही है। यात्रियों की परेशानी लगातार बढ़ रही है, ऐसे में, रेलवे को प्राथमिकता के साथ न केवल हादसों से बचना होगा, बल्कि अपनी सेवा का स्तर भी सुधारना होगा।


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