सम्पादकीय

रूस-यूक्रेन युद्ध और महामारी ने आपूर्ति को बाधित कर मुद्रास्फीति को 8 वर्ष के सबसे उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है

Rani Sahu
14 May 2022 12:23 PM GMT
रूस-यूक्रेन युद्ध और महामारी ने आपूर्ति को बाधित कर मुद्रास्फीति को 8 वर्ष के सबसे उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है
x
महंगाई आसमान छू रही है. इसकी माप उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के जरिए की जाती है

टीके अरुण - महंगाई आसमान छू रही है. इसकी माप उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के जरिए की जाती है. इसे लेकर क्या किया जा सकता है और क्या किया जाना चाहिए? बीते 4 मई को आरबीआई (RBI) की मौद्रिक नीति समिति ने अचानक एक मीटिंग की, जिसमें रेपो रेट (Repo Rate) में 40 बेसिस की बढ़ोतरी की घोषणा की गई. तो क्या बढ़ती महंगाई (Inflation) पर काबू पाने के लिए आरबीआई को इन दरों में और वृद्धि करनी चाहिए? महंगाई की एक ही वजह नहीं होती और मांग-आधारित महंगाई के लिए अलग तरह के उपायों की जरूरत होती है जबकि सप्लाई के कारण होने वाली महंगाई को दूसरे तरीके से काबू किया जाता है. इन दिनों पूरी दुनिया समेत भारत में जारी महंगाई का कारण सप्लाई में पड़ रही बाधाएं हैं. हालांकि, इसमें मांग की भी भूमिका है. जैसे कि देश में पड़ रही भारी गर्मी की वजह से बिजली की मांग बहुत अधिक बढ़ गई है.

लेकिन मौजूदा महंगाई की वजह अतिरिक्त मांग नहीं है, जिससे और अधिक मौद्रिक सख्ती से निपटा जाए. बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की अपेक्षा करना या उसे सही ठहराना गलत होगा. युक्रेन युद्ध के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं. रूसी एनर्जी (कोयले, तेल और गैस) पर पश्चिम के प्रतिबंध लगे हैं इसलिए दूसरे देशों से आयात करने का प्रयास किया जा रहा है. गैर-पारंपरिक ऊर्जा के खरीदार यूरोप की ओर से आ रही अतिरिक्त मांग के कारण पारंपरिक ऊर्जा (कोयला वगैरह) पर निर्भर देशों के लिए कीमतें बढ़ रही हैं.
रूस और यूक्रेन दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातक देश हैं
रूस और यूक्रेन दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातक देश हैं. युद्ध के कारण इसके निर्यात में बाधा पहुंच रही है और असामान्य रूप से इसके दाम बढ़ गए हैं. खाद्य तेल में भी इसी तरह के हालात हैं. यूक्रेन, जो कि सनफ्लावर सीड का भी बड़ा निर्यातक है, से इस वर्ष इसका निर्यात नहीं हो पा रहा है. कोरोना महामारी के कारण मलेशिया और इंडोनेशिया में मजदूरों की भारी कमी हो गई, जिसकी वजह से पामऑयल के प्लांटेशन में दिक्कतें आईं और उत्पादन कम हुआ. इंडोनेशिया ने पाम ऑयल के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है. इसके कारण खाद्य तेलों के दाम में भारी बढ़ोतरी हुई. ब्रेड और बिस्किट गेहूं के आटे, खाद्य तेल से बनते हैं और इसकी बेकिंग के लिए ईंधन की जरूरत होती है.
अब जब कि, इन तीनों कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि हो चुकी है, तो ब्रेड और बिस्किट के दाम भी बहुत बढ़ गए. जब तक यह युद्ध खत्म नहीं हो जाता खाद्य कीमतें ऊंची बनी रहेंगी. रूस के साथ-साथ इसके सहयोगी बेलारूस पर भी प्रतिबंध लगे हुए हैं, ये दोनों देश उर्वरकों और इससे संबंधित उत्पादों के बड़े निर्यातक हैं. इससे कृषि-रसायनों की कमी पड़ेगी और कम-से-कम एक सीजन के लिए पूरी दुनिया में उत्पादन पर असर पड़ेगा. महामारी और इससे लड़ने के गलत तरीके, जैसे कि चीन की ज़ीरो कोविड रणनीति की तर्ज पर लॉक-डाउन लगाना, से सप्लाई पर बुरा असर पड़ता है और तैयार माल की कमी होती है. इससे कीमतें भी बढ़ती हैं.
कीमत वृद्धि पर काबू पाने के लिए बेहतर होगा कि महंगाई को अर्थव्यवस्था के हाथों ही सौंप दिया जाए, बजाए इसके कि इस पर बेजा काबू पाने की कोशिश हो. लोग खपत पर अंकुश लगाएंगे और जिन वस्तुओं की कीमतें ज्यादा हैं उनके उत्पादन और परिवहन के विकल्प के तरीके खोजेंगे. यह तरीका तभी काम करेगा जब कीमतों को लचीला रखा जाएगा. यदि आयातित कोयले की उच्च कीमत को, उपभोक्ताओं पर नहीं लादा गया तो बिजली वितरण कंपनियों के पास कोयले के लिए भुगतान करने के लिए पैसा नहीं होगा और इससे कोयले का आयातबंद हो जाएगा, जिससे कोयले की कमी हो जाएगी. बिजली की कमी से उत्पादन में कमी आएगी, जिससे कीमतों में और वृद्धि होगी.
महंगाई से क्रय शक्ति कम होती है
लचीली कीमतों और कुशल बाजार का होना, महंगाई पर लगाम लगाने के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अतिरिक्त मांग से बचना. महंगाई से क्रय शक्ति कम होती है. जिनकी आय निश्चित है, उनकी वास्तविक खपत में कमी आएगी, भले ही उनकी सांकेतिक खपत समान रहे. राष्ट्रीय आय की एकाउंटिंग, हमें बताती है कि सकल मूल्य वर्धित (GVA), कुल लाभ और मजदूरी और वेतन का योग है. महंगाई के कारण मजदूरी और वेतन में वास्तविक रूप से गिरावट आती है. इससे आय वितरण बदलाव आएगा और यह वेतनभोगी से शिफ्ट होकर और लाभ कमाने वालों के हाथ आएगा. इन अतिरिक्त लाभों पर टैक्स लगाने और इससे प्राप्त आय का उपयोग महंगाई से प्रभावित गरीबों को राहत देने के लिए किया जा सकता है.
हालांकि, नया टैक्स थोपना जटिल होता है और इसे वापस लेना मुश्किल होता है, इसलिए बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि मध्यम अवधि में निवेश और विकास को हतोत्साहित किया जाए. हालांकि, फ्यूअल कंपनियों के अप्रत्याशित लाभ पर कुछ शर्तों के साथ अल्पकालिक करें लगाई जासकती हैं. महंगाई के कुछ सकारात्मक पक्ष भी होते हैं. जिन लोगों ने कर्ज लिया है उनके लिए इसे चुकाना आसान हो जाता है, भले यह कर्ज घरेलू हो. महंगाई से कंपनियों के टर्नओवर में बढ़ोतरी होती है और सरकार के टैक्स रेवेन्यू में इजाफा होता है. फिक्स्ड रेट पर लिए कर्ज पर, वास्तविक रेट (नॉमिनल रेटमें महंगाई की दर को घटाने पर प्राप्त होने वाला रेट) में कमी आती है.
महंगाई, अर्थव्यवस्थाओं के लिए कर्ज के बोझ को हल्का करने का एक तरीका भी है. कर्ज की एक सीमित राशि, महंगाई की कम दर के साथ एक छोटे जीडीपी की तुलना में बड़े नॉमिनल जीडीपी (महंगाई के कारण) का, एक छोटा हिस्सा होता है. क्योंकि व्यावहारिक रूप से दुनिया भर की सभी सरकारों ने महामारी और इसका मुकाबला करने के लिए भारी उधार लिया है, इसलिए अपनी अर्थव्वस्था में महंगाई को बढ़ाना, कर्ज के बोझ को कम करने का एक तरीका है. बशर्ते कि महंगाई की दर इतनी भी ज्यादा न हो कि ग्रोथ रेट को पूरी तरह से बाधित कर सके.
इस तरह के उपाय कुछ अस्थायी राहत ज़रूर देंगे
महंगाई का असर एक्सचेंज रेट पर भी पड़ता है. दो मुद्राओं के बीच एक्सचेंज रेट में परिवर्तन होता है. यह परिवर्तन कीमतें बढ़ने की दर, विभिन्न रेट वाली ब्याज दरों, और उत्पादकता में आए बदलाव से प्रभावित होता है. अभी, भारत और अमेरिका में महंगाई दर करीब आठ फीसद है. इसका अर्थ है कि रुपये की कमज़ोरी में इनकी महंगाई दरों का अंतर शामिल नहीं है. उभरते बाज़ारों में ज़्यादा जोखिम की अवधारणा और अभी तक चल रही उदारवादी मौद्रिक नीति से हाथ खींचने के अमीर देशों के फैसले से उभरते देशों से अमीर देशों की ओर कैपिटल फ्लो रिवर्स हुआ है और यही उभरते देशों की मुद्रा के अवमूल्यन के लिए जिम्मेदार हैं. डॉलर येन के मुकाबले तगड़ा हुआ है. यूरो और ब्रितानी पाउंड युआन, दक्षिण-पूर्व एशिया की मुद्राओं और भारतीय रुपये की तुलना में मज़बूत हुए हैं. इससे रुपये में आयातित सामान की कीमत बढ़ जाती है. रुपये की कमज़ोरी और ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमत उत्पादन की पूरी चेन में कीमत बढ़ा देती है जिससे महंगाई में वृद्धि होती है. राजनीतिक दल अब महंगाई से निपटने के लिए ईंधन पर टैक्स कटौती की मांग कर रहे हैं. ज़ाहिर है इस तरह के उपाय कुछ अस्थायी राहत ज़रूर देंगे.
लेकिन लगातार जारी महंगाई से राहत पाने के लिए व्यापक स्तर पर आर्थिक उपाय करने होंगे. सप्लाई से अर्थव्यस्था में आने वाली वाली बाधा को अर्थव्यवस्था में ही मांग और खपत के पैटर्न में बदलाव और उत्पादन की लागत कम कर, फाइनेंशियल सिस्टम से लिक्विडिटी को कम कर और ब्याज दरों को बढ़ाकर महंगाई पर काबू पाया जा सकता है. भारत राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर अच्छा प्रबंधन कर रहा है. ब्याज दरों में वृद्धि और मौद्रिक तरलता प्रबंधन के माध्यम से अतिरिक्त मांग को कम कर रहा है, राजकोषीय घाटा अत्यधिक नहीं है, इसलिए नहीं कि यह बजट में घोषित सकल घरेलू उत्पाद का 5.4 फीसद है, बल्कि इसलिए कि निजी क्षेत्र कीनिवेश योजनाएं रुकी हुई हैं. सरकार की तरफ से निवेश की मात्रा बढ़ाने पर सवाल लगा हुआ है. यह राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शिता का सवाल है. हम कह सकते हैं कि इस संबंध में हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि सरकार की तरफ से क्या पहल होती है.
Next Story
© All Rights Reserved @ 2022Janta Se Rishta