सम्पादकीय

बावरा मन: 'कमाल' की बात है, इसलिए आज मन बहुत खामोश है!

Gulabi
15 Jan 2022 4:37 PM GMT
बावरा मन: कमाल की बात है, इसलिए आज मन बहुत खामोश है!
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लखनऊ की तहज़ीब की नुमाइंदगी करते, सबको अदब की भाषा से रू ब रू करवाते
तकरीबन एक साल पहले की बात है. इसी बावरे मन के एक लेख "लखनऊ के लड़कों की अदा" में आपका जिक्र कुछ यूं हुआ था…
कमाल की बोली
लखनऊ की तहज़ीब की नुमाइंदगी करते, सबको अदब की भाषा से रू ब रू करवाते…. न्यूज एंकरों की चींचीं पों पों के बीच, अपनी एक अलग मिसाल कायम करते, ये हैं कमाल खान साहेब. कमाल की बोली और कमाल ही की रिपोर्टिंग. जैसे, एकदम खरा सोना.
"कैमरामैन 'चाहे जो' के साथ, लखनऊ से मैं कमाल खान".
हमें ये सुनते सुनते और इन्हें ये कहते कहते, दो दशक से ज़्यादा हो गए हैं. टीवी पर जब वो ये कह के बात खत्म करते हैं, लगता है भैया काहे बात खत्म कर रहे हैं, बोलते जाएं, बोलते जाएं. ज़बान से लखनऊ की तहज़ीब टपकाते जाएं. इन पक्के वाले लख्नऊआ लड़के 'कमाल खान का जिस तरह का जर्नलिज्म का अपना कैरियर रहा है, उन्हें यकीनन दिल्ली बॉम्बे की गलियां खूब आवाज़ें देती रही होंगी. पर जनाब इनको जो मज़ा अयोध्या जी में, सरयू किनारे तुलसी दास की चौपाइयां सुनाने में आता है, वो क्या ख़ाक किसी स्टूडियो में "तू तू मैं मैं" करने से आएगा.
दरअसल ये, लखनऊ की गंगाजमुनी धरती का ही "कमाल" है कि यहां खान साब का लड़का, रामायण की चौपाइयां बांचता है और बाजपाई जी का लड़का (हिमांशु बाजपाई), इमामबाड़े में बैठ, मर्सिया पढ़ता है.
सच कहूं तो, गणेश शंकर विद्यार्थी जी वाले "स्कूल" की पत्रकारिता को आपने ही जिंदा रखा है. इस दौर में भी आप उनके सबसे काबिल "स्टूडेंट" की तरह रहे हैं.
प्रिय रुचि जी और कमाल भाई
आप दोनों पति पत्नी मेरे इस "बावरे मन" से पहले दिन से ही जुड़े थे. "बावरे मन" का एक भी लेख ऐसा नहीं रहा जो आप दोनों ने पढ़ा ना हो और जिसके बारे में हमारी बात न हुई हो. ये मेरे लिए गर्व की बात थी कि आप दोनों ही हमेशा मुझे एक अच्छे मित्र की तरह पढ़ते रहे और अपनी राय सांझा करते रहे. प्रोत्साहित करते रहे. मुझे भी बच्चों जैसी जिज्ञासा रहती, कि इस बार के लेख पर आप क्या कहेंगे.
अभी परसों ही पिछले हफ़्ते वाले "फूल बाग" पर लिखे लेख पर मैसेज का आदान प्रदान हुआ था. उस आदान प्रदान में आप ने एंथ्रोपोलॉजी वाले प्रोफेसर नदीम हसनैन साहेब का अमरीका से हमारे लिए भेजा गया मैसेज हमें फॉरवर्ड किया था और मैंने भी आपको लिखा था कि, "लखनऊ वापिस आते ही सबसे पहले आप तीनों को मिलने आयेंगे."
हम आए, पर आप तो मिलने से पहले ही निकल लिए. "तीन" को "दो" कर गए. ये अच्छा नहीं किया कमाल भाई. जबसे आपके जाने की खबर सुनी है, भगवान पर से विश्वास उठ चुका है. इस दुनिया में जहां हमारे दोस्तों का दायरा वैसे भी बहुत सिकुड़ चुका है, ऐसे में आप, रुचि और "आपका अमन" यानि आप तीनों, मेरे लिए सुकून वाली दोस्ती का पर्याय हो गए थे. कानपुर में रहते हुए हम आपके घर की इसी "दोस्तों" वाली बैठकी को मिस किया करते थे.
आपका घर हमेशा हमारे लिए एक सुकून देने वाली जगह बन गया था. हमारे लिए लखनऊ की हमारी एकमात्र मित्र रूपी अड्डेबाज़ी की जगह. वो घर, वो जगह जहां पहली बार मुझ जैसी बाथरूम सिंगर को "बाथरूम" से निकाल आप और रुचि ने महफिल में गुनगुनाने को मजबूर कर दिया था. और फिर तो वो दौर चलते ही रहे. मेरा वो टूटा फूटा गाना और आपका वो बिल्कुल लखनऊ वाली शराफत से दाद देना. यकीन मानिए, धीरे धीरे आपके घर का न्योता, जीवन भर के सारे न्योतों से ऊपर होता चला गया. और आपका घर…
कमाल का घर
"कमाल भाई का घर" आखिर है क्या?
वो घर…
कमाल की जहनियत, कमाल की बातें, कमाल की किताबें, कमाल के फूल, कमाल के किस्से, कमाल की मेहमान नवाज़ी, कमाल के पसंद के खाने, कमाल की पसंद की मक्खन मलाई, कमाल की चाची के हाथों की बनी रोटी, कमाल की रुचि, कमाल के अमन से बनता है. वो घर जिसमें रुचि कमाल की पसंद का ध्यान रखतीं, कमाल सबकी पसंद का ध्यान रखते. इस जोड़ी को, अलग होते देख, इस घर को देख, आज रुलाई निकल गई.
इस घर को बहुत ही सुरुचिपूर्ण तरीके से रुचि और कमाल ने अपने हाथों से सजाया है. इस घर का कोना कोना. ड्राइंग रूम की एक पूरी दीवार लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों के स्केचेस से पटी हुई है. बहुत कम मर्दों में घर सजाने संवारने का ऐसा गुण होता है. और सिर्फ़ सजाया ही नहीं, वो खुद हाथ से काम कर, घर के कोने कोने को तरतीब से मेंटेन भी रखते थे. हम अक्सर उन्हें छेड़ते थे कि यही हाथ से किया काम दोनों पति पत्नी को इतना चुस्त दरुस्त और युवा रखता है.
और, फिर इसी सजे संवरे घर में, कमाल का ये छोटा सुखी परिवार, बिलकुल लखनऊ की तहज़ीब अनुसार, दोस्तों की मेहमाननवाज़ी में लगता था. कमाल भाई के इस परिवार में वो बूढ़ी "चाची" भी हैं जो आज ठगी हुई सी हालत में उसी घर का एक कोना पकड़ बैठी हुईं, कह रही थीं, "जाने की उम्र तो मेरी थी".
वो घर जिसमें हमारी छोटी सी "टोली" ने बड़ी अड्डेबाज़ी की है. एक दूसरे को सुना और सुनाया है. एक दूसरे को समझा है. वो घर, जिसकी छत और जिसकी टेरेस कमाल के हाथों से लगे फूलों से सजी हैं. कमाल भाई को बागबानी का ज़बरदस्त शौक था. फूलों की, मिट्टी की, खाद की बड़ी नॉलेज रखते थे. अपने हाथ से मिट्टी खाद का मिक्सचर बनाना, गुड़ाई निराई करना, गमलों को खुद अपने हाथों से कतारों में सजाते थे. आज उन्हीं फूलों के बीच गमगीन दोस्त बैठे फूलों को नहीं शून्य को निहार रहे थे.
कमाल भाई, आज हमारे दोस्तों का दायरा सिकुड़ गया है. एक दोस्त कम हो गया है. हमारे लिए अब लखनऊ, सच में "वो पहले वाला लखनऊ" नहीं रह गया है. वीरान हो गया है, उजाड़ हो गया है. लखनऊ की नुमाइंदगी करने वाला, "लखनऊ से मैं कमाल खान" कहने वाला हमारा दोस्त नहीं रहा है. और जैसा हमारी आपकी टोली वाले दोस्त फसीहउद्दीन अहमद साब कहते हैं, "तुम्हारे जाने के बाद मेरे भाई, अब सहाफत में किसी अल्फाज़ को हुरमत(dignity) नहीं मिलने वाली"
हमारी कोशिश रहेगी, आपके वाले अमन और हमारे वाले अमन के लिए, हम एक प्यारा सा, सच्चा सा, झूठ फरेब से दूर सुकून भरा एक बेहतर कल मुमकिन कर पाएं. ठीक वैसा ही कल, जैसा आप चाहते थे. आप जहां भी हैं, वहीं से हम पे नज़र रखिएगा, हमारे अमन और अपने अमन के पथप्रदर्शक बने रहिएगा. रुचि और अमन का हम यहां ख्याल रखेंगे, आप वहां से रखिएगा. आपने जीवन में बहुत "गुडविल" कमाई है.
ख़ैर, आज हमने एक दोस्त को, अपने फेवरेट "लखनऊ ब्वॉय" को सुपुर्दे ख़ाक किया है परंतु एक बेहतर, प्यारे कल के आपके सपने को सुपुर्दे ख़ाक नहीं होने देंगे. आमीन!


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ज्योत्स्ना तिवारी अधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी
ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.
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