जनता से रिश्ता वेबडेस्क  इटली के एक शल्य चिकित्सक पाओलो मैकियारिनी पर शोध कार्य में वैज्ञानिक दुराचरण और नैतिकता सम्बंधी मापदंडों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। उनकी संस्था कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था। उनके शोध पत्रों को वापस लेने की कार्रवाई की गई थी। उनका वह शोध अंगों के पुनर्जनन को लेकर था। किंतु अब पता चला है कि, एक शोध पत्रिका में उन्होंने फिर से लगभग उसी विषय पर शोध पत्र प्रकाशित किया है। इसे लेकर विज्ञान जगत में खलबली है।
कुछ साल पहले मैकियारिनी ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। जिसमें कहा गया था कि, उनकी टीम ने कृत्रिम सांस नली (ट्रेकिया) का निर्माण करके उस पर मरीज़ की स्टेम कोशिकाओं को पनपाया था। फिर इस तरह से विकसित सांस नली को मरीज में प्रत्यारोपित किया था। किंतु एक स्वीडिश डॉक्यूमेंटरी में उजागर किया गया था कि, उनका यह प्रयोग पूरी तरह असफल रहा था। एक को छोड़कर बाकी सारे मरीजों की मृत्यु हो गई थी। जो एक मरीज जीवित बचा, उसने प्रत्यारोपित ट्रेकिया को हटवा लिया था।
इसके बाद जो जांच हुई उसमें पाया गया कि, मैकियारिनी के कई शोध पत्रों में वैज्ञानिक दुराचरण के प्रमाण हैं। वे उस समय स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में कार्यरत थे, जहां से उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। उनके सारे शोध पत्रों को खारिज करने की कार्रवाई की गई थी।
हाल में एक ऑनलाइन पत्रिका जर्नल ऑफ बायोमेडिकल मटेरियल्स रिसर्च पार्ट बी: एप्लाइड बायोमटेरियल में मैकियारिनी का शोध पत्र प्रकाशित हुआ है। इसमें कहा गया है कि, उनकी टीम ने पोलीमर पदार्थ से ऐसे ढांचे बनाए हैं जो बैबून की ग्रास नली (इसोफेगस) के समान हैं। टीम का कहना है कि, उन्होंने मानव वसा ऊतक और अस्थि मज्जा से स्टेम कोशिकाएं लेकर इस ढांचे पर पनपाया तो कुछ कोशिकाएं जीवित रहीं और ढांचे से चिपक गर्इं। शोध पत्र में कहा गया है कि, उनके बनाए गए ऐसे ढांचे कृत्रिम अंगों के निर्माण में मददगार होंगे।
मगर अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि, मैकियारिनी के इस शोध पत्र में भी वही दिक्कतें हैं जो पहले के शोध पत्रों में थी जिन्हें खारिज किया जा चुका है। शोधकर्ताओं का मत है कि इस तरीके से कभी एक कामकाजी ग्रास नली का निर्माण नहीं किया जा सकता।
उक्त शोध पत्र में कई अन्य धोखाधडिय़ों की बात भी सामने आई है। सभी लोगों का मत है कि, जिस जर्नल ने इन शोध पत्रों का प्रकाशन किया है उसे इतनी लापरवाही नहीं करनी चाहिए। संपादकों का कहना है कि, उन्हें मैकियारिनी के अतीत के बारे में कुछ पता नहीं था। वैसे यह हैरत की बात है क्योंकि यह बात सबको पता थी कि, पहले मैकियारिनी के शोध पत्र खारिज हुए थे। अब नए सिरे से जांच की बात कही जा रही है।